तीन तलाक पर रोक के लिए शीत सत्र में विधेयक लाएगी सरकार

नई दिल्ली,

एक साथ तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार कानून बनाने पर विचार कर रही है.
टीवी रिपोर्ट्स के मुताबिक मोदी सरकार शीतकालीन सत्र में तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए विधेयक पेश कर सकती है. पिछले दिनों ही सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक पर रोक लगाते हुए सरकार को कानून बनाने की सलाह दी थी.

तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस नजीर ने अल्पमत में दिए फैसले में कहा था कि तीन तलाक धार्मिक प्रैक्टिस है, इसलिए कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा.हालांकि दोनों जजों ने माना कि यह पाप है, इसलिए सरकार को इसमें दखल देना चाहिए और तलाक के लिए कानून बनना चाहिए.

दोनों ने कहा कि तीन तलाक पर छह महीने का स्टे लगाया जाना चाहिए, इस बीच में सरकार कानून बना ले और अगर छह महीने में कानून नहीं बनता है तो स्टे जारी रहेगा. खेहर ने यह भी कहा कि सभी पार्टियों को राजनीति को अलग रखकर इस मामले पर फैसला लेना चाहिए.

शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और इससे जुड़े दूसरे मामलों (डब्ल्यूपी(सी) नंबर. 118/ 2016) में 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मुस्लिम पतियों द्वारा अपनी पत्नियों को तीन तलाक देने पर रोक लगा दी थी.

देश के पर्सनल लॉज में यह फैसला वास्तव में एक टर्निंग पॉइंट है. यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मिले समान अधिकार और समान सुरक्षा को कायम रखता है, भले ही व्यक्ति अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक.

इस फैसले के बाद अब महिलाओं को तलाक-ए-बिद्दत की व्यवस्था से छुटकारा पाने में काफी मदद मिलेगी. गौरतलब है कि इस एकतरफा व्यवस्था में पति बड़ी आसानी से तीन तलाक दे देते थे और महिलाएं कुछ नहीं कर पाती थीं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से ऐसा माना जा रहा था कि सरकार जल्द ही कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है. कानून बनने के बाद इस तरह से तीन तलाक अपराध की श्रेणी में आ जाएगा. महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्सनल लॉ में सुधार की मांग मुस्लिम समुदाय की ओर से ही उठाई गई थी.

वैसे, सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भी तलाक-ए-बिद्दत के द्वारा तलाक देने के कई मामले सामने आए हैं. मुस्लिम पतियों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की जानकारी नहीं होने के कारण ऐसा हो सकता है.

इस तरह से तलाक देने पर दंडित किए जाने का प्रावधान नहीं होने के कारण भी ऐसा हो सकता है. मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा विरोध करने के बावजूद तलाक-ए-बिद्दत के जरिए तलाक देने के चलन में कोई कमी नहीं आई है.

हाल ही में खबर आई थी कि एक बड़े शैक्षिक संस्थान से जुड़े एक शख्स ने वॉट्सएप और एसएमएस से अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था. इसके बाद पत्नी ने पुलिस से इसकी शिकायत की थी. माना जा रहा है कि देश में ऐसे कई मामले हो सकते हैं, जो सामने नहीं आए हों.

मौजूदा कानून के तहत तलाक-ए-बिद्दत के पीडि़तों के पास पुलिस के पास जाकर शिकायत दर्ज कराने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है क्योंकि मौलवी भी उनकी कोई मदद नहीं करते हैं. कानून में प्रावधान नहीं होने के कारण पुलिस भी ऐसे पतियों के खिलाफ कोई कड़ा कदम नहीं उठा पाती है.

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