इस साल 2016 में मध्यप्रदेश में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंती बड़े ही भव्य रूप में मनायी है. पूरा भारत और विश्व स्तर पर संयुक्त राष्ट्र बाबा साहब का बड़ी श्रद्धा से स्मरण कर रहा है. मध्यप्रदेश में उनके जन्म स्थान महू में उसका आयोजन विशेष और स्मरणीय रहेगा. पहली बार कोई प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उनके जन्म स्थल पर जाकर नमन किया. उसके बाद पास ही मैदान से राष्टï्रीय स्तर का केन्द्र सरकार का कार्यक्रम ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ अभियान को प्रारंभ किया.

भारत का संविधान विचार और भावना के रूप में चुनी हुई संविधान सभा ने बनाया. पर उन विचारों को सही अर्थ और शब्दावली डॉक्टर अम्बेडकर ने ही दी. वे संविधान सभा की प्रारूप समिति (डेफ्टिंग कमेटी) के चेयरमेन थे और डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे. बाबा साहब संविधान सभा के सदस्य थे.

हमारा संविधान बाबा साहब का प्रतिरूप प्रतिबिम्ब है. भारत में जाति प्रथा एक कलंकित व अमानवीय प्रथा उससे भी बद्तर थी, जो अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका में गोरों की रंगभेद नीति थी. जिसके विरुद्ध संघर्ष छेड़कर बेरिस्टर गांधी महात्मा बने थे. भारत के 60 प्रतिशत लोग शूद्र्र और पिछड़े वर्ग के हैं. इनमें से कुछ को जाति के आधार पर अछूत तक माना गया. उनकी त्रासदी इस हद तक थी कि वे कुओं-तालाबों से पानी नहीं ले सकते हैं. बम्बई (मुम्बई) ऐसे महानगर में जब कोई तथाकथित उच्च जाति का व्यक्ति नल खोलता था तब दलित वर्ग का व्यक्ति पानी पी सकता था. बाबा साहब ने महाद में दलितों को तालाब से पानी लेकर आततायी प्रथा के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद किया था. जो व्यक्ति देश के 60 प्रतिशत लोगों की लड़ाई लड़ रहा है, उसे केवल दलित नेता मानना बिल्कुल गलत है. वे सम्पूर्ण राष्टï्र के नेता हैं. पीडि़त मानवता के मसीहा हैं.

देश की राजनीति में यह राजनैतिक परम्परा रही है राष्टï्रीय स्तर के नेताओं को समग्र भारत के नेता के रूप में हमेशा माना गया. तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, नेताजी सुभाष कभी मराठी, गुजराती, पुरुविया, कुर्मी, मुसलमान या बंगाली के रूप में नहीं माने गए. उसी तरह बाबा साहब को दलित अपना मसीहा मानते हैं, लेकिन वह पूरे भारत के मसीहा हैं. महू के समारोह में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने उनका स्मरण करते हुए कहा कि वे व्यक्ति ही नहीं बल्कि संकल्प थे. आज उनके कारण ही मोदी पिछड़े वर्ग का व्यक्ति जिसकी मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजने का काम करती थी, उसका बेटा आज प्रधानमंत्री
बन सका.

बाबा साहब को सही श्रद्धांजलि उसी दिन होगी, जब इस देश में जाति-प्रथा समाप्त होगी, कोई दलित नहीं होगा. कभी मंदिरों के और उनके भगवानों के दर्शन दलित वर्ग के लिए बंद थे. बाबा साहब ने मंदिर प्रवेश का आंदोलन भी उसी तरह चलाया जिस तरह उन्हीं की प्रेरणा से तृप्ति देसाई ने महिलाओं के मंदिर प्रवेश के लिए शिंगणापुर के शनि मंदिर, कोल्हापुर का लक्ष्मी मंदिर और शबरीमाला के मंदिर के लिये महिला अधिकार संघर्ष चलाया है. अभी भी तर्क- कुतर्क चल रहे हैं.

पहले कहा गया शिंगणापुर में पुरुष भी नहीं जाते थे क्योंकि महिलाओं को यह अधिकार नहीं देता. वह भी नहीं चला और महिला प्रवेश हो गया. कोल्हापुर में कहा कि पंजाबी लिबास में महिला क्यों गई. लिबास तो लिबास होता है उसमें भद्रता या अभद्रता तो देखी जा सकती है लेकिन प्रांतीयता क्या होती है. शबरीमाला के बारे में कहा जा रहा है कि वहां के देवता ब्रह्मïचारी हैं. लेकिन जो पुरुष वहां जाने दिये जा रहे हैं उनके बाप तो ब्रह्मïचारी नहीं थे वरना ये होते ही नहीं वे क्यों जा रहे हैं. उनकी मां के मासिक धर्म की अवस्था आने के बाद ही वे गर्भ में आए. उन्हें क्यों जाने दिया जाए. लड़के को मूछें आना और लड़की को मासिक धर्म आना युवा अवस्था का प्रारंभ है. इसमें शुद्ध-अशुद्ध कुछ नहीं होता. यदि ऐसा हो तो जिनको मूंछें आ गयी हैं- उन्हें भी नहीं जाने दिया जाना चाहिए.

अभी विषमता के विरुद्ध बहुत कुछ करना बाकी है. हम एक तरफ बाबा साहब को याद कर रहे हैं और आज भी गुजरात के मेहसाणा के बेचारा जी गांव में पिछड़े वर्ग की महिलाएं कुएं से पानी नहीं भर सकतीं. कोई तथाकथित ऊंचे वर्ग की महिला ही उन्हें पानी खींच कर देती हैं. वे उसके इंतजार में बैठी रहती हैं. श्रद्धांजलि जाति, नर-नारी व ऊंच-नीच को मिटाकर ही दी जा सकती है.

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