सुप्रीम कोर्ट ने सुन्नी बोर्ड की यह प्रार्थना और दलील को नहीं माना कि अयोध्या-रामलला मंदिर व बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई जुलाई 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद की जाए, क्योंकि इसके फैसले से देश पर असर पड़ेगा. इसलिये जल्दी सुनवाई की जरूरत
नहीं है.

सुन्नी बोर्ड के वकील श्री कपिल सिब्बल ने इसके अलावा यह भी कहा कि अभी मामले से संबंधित कागजों को अनुवाद व तैयार करने का काम पूरा नहीं हुआ है. इसका खंडन करते हुए सरकार की ओर से एडीशनल सोलीसीटर जनरल श्री तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि दस्तावेजों से संबंधित कार्य पूरा है.

मामले को टालने के लिये श्री सिब्बल ने यह दलील भी दी कि तीन जजों की यह पीठ इस मामले को पांच या सात जजों की पीठ को सौंप दे. चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की तीन सदस्यीय बैंच ने इस सुझाव को भी अस्वीकार कर दिया.

सुन्नी बोर्ड का पूरा प्रयास यही रहा कि मामले की सुनवाई किसी न किसी मुद्दे पर टाल दी जाए. चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा ने इन बातों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सुन्नी बोर्ड की तरफ से श्री कपिल सिब्बल की दलीलें बेतुकी हैं.

हम राजनीति नहीं केस के तथ्य देखते हैं. कोर्ट के बाहर क्या हो रहा है उससे हमें मतलब नहीं. तीन सदस्यीय बैन्च ने कहा कि पहले सभी पक्षकार जनवरी में सुनवाई के लिये तैयार हो गये थे और अब सुन्नी बोर्ड कह रहा है कि सुनवाई जुलाई 2019 के बाद हो.

सुप्रीम कोर्ट ने मामला टालने की दलीलों को अस्वीकार करते हुए 8 फरवरी को अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी है. यही बैन्च सुनवाई करेगी. तब तक सभी पक्ष दस्तावेज पूरे करे और मामले की सुनवाई टाली नहीं जायेगी.

इस सुनवाई में सबसे पहले शिया वक्फ बोर्ड के वकील ने विवादित स्थल पर मन्दिर बनाये जाने का समर्थन किया जिसका सुन्नी बोर्ड ने विरोध किया. शिया और सुन्नी मुसलमानों में बाबरी मस्जिद को लेकर भी दावेदारी में विरोध चल रहा है.

शियाओं का कहना है कि बाबरी मीर वाकी ने बनवाई थी जो शिया मुसलमान था और बाबरी शिया मस्जिद है- सुन्नियों का उसमें कोई दखल नहीं है.सुप्रीम कोर्ट में अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ चल रही है. जिसने 30 दिसम्बर 2010 को अपने फैसले में विवादित क्षेत्र की दो तिहाई जमीन हिन्दुओं और एक तिहाई मुसलमानों को देने का आदेश दिया था.

इस फैसले से दोनों ही रामलला मन्दिर व बाबरी मस्जिद पक्ष सहमत नहीं थे और दोनों ही पक्षों ने इस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की है और यह उन्हीं अपीलों की सुनवाई है जो अभी सुप्रीम कोर्ट में हो रही है.

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