रोजगार-नौकरी चाहिये या उन्नति की चाह- इन्सान अवसर बनाता है या ढूंढता है. गरीब देशों में यह प्रवृत्ति होती है कि वहां के लोग रोजगार की तलाश में सस्ते मजदूर के रूप में औपनिवेशक ताकतें भारत के संदर्भ में अंग्रेज शासक भारतीयों को परमिट देकर फिजी, मालद्वीप, वेस्ट इंडीज के देशों में ले गये. ये लोग ‘परमिट’ को गिरमिट बोलते थे इसलिये अब इनका स्थाई सम्बोधन ‘गिरमिटियाÓ हो गया है. इसी तरह अमेरिका के सम्पन्न उद्योगपति सस्ते मजदूर के रूप में अफ्रीका के गुलाम बाजारों में काले लोगों (अश्वेत) को खरीदकर अमेरिका ले गये और वहां अश्वेत आबादी भी काफी हो गयी. भारत में जिस तरह अंग्रेजों से आजादी पाने का संघर्ष चला उसी तरह अमेरिका श्वेत (गोरों) से बराबरी पाने के लिए अश्वेतों नेे श्वेत समाज से संघर्ष किया. जिसकी परिणिति 21वीं सदी में केन्याई मूल के अश्वेत अफ्रीकी श्री बराक ओबामा के अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्टï्रपति बनने से हुई.

आजादी के बाद भारत के उन्मुक्त प्रजातंत्रीय वातावरण में भारत के उद्योगपतियों ने भी प्रगति में ऊंची छलांग लगानी चाही लेकिन देश की पहली सरकारों को राष्टï्रीयकरण और समाजवाद की राजनीति नशे की तरह सवार हो गयी और उसमें भी हिमाकत यह भी की गयी जो कुछ खास निजी क्षेत्र में था उसका भी राष्टï्रीयकरण कर दिया. उसमें टाटा की टाटा एयरवेज और बिड़ला की भारत एयरवेज का भी राष्टï्रीयकरण कर उसे एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के नाम से सरकारी उपक्रम बना दिया. बैंकों व बीमा कम्पनियों का राष्टï्रीकरण कर दिया. इसकी प्रेरणा रूस के साम्यवाद से ली गयी थी. बीसवीं सदी के खत्म होते-होते रूस में उनका राजनैतिक स्वरूप ‘सोवियत यूनियनÓ और उनकी नीति ‘साम्यवादÓ और भारत में राष्टï्रीयकरण व समाजवाद दोनों ही बुरी तरह असफल होकर ध्वस्त हो गये और देशों का समुचित विकास न होकर वे बरबाद हो गये. अब भारत में फिर से निजी क्षेत्र व फ्री एंंटरप्राइज का दौर आया हुआ है. बैंक, बीमा, हवाई यातायात आदि सभी कुछ निजी क्षेत्र व फ्री एंटरप्राइज के लिए खोल दिया गया है.

राष्टï्रीयकरण के दौर में यहां बड़े उद्योगों का अवसर न होने से भारत के बड़े उद्योगपति उस दिशा में कुछ कर ही नहीं पाये. स्वराजपाल जैसे उद्योगपति अवसर न होने के कारण पलायन करके ब्रिटेन में जा बसे वहां की नागरिकता ले ली. आज स्वराजपाल ब्रिटेन के जाने-माने उद्योगपति हैं और वहां के नागरिक होकर हाऊस ऑफ लाड्र्स के मेम्बर हैं.

अभी भी भारत में सरकार की नीतियां और टैक्स प्रणाली उद्योग के अनुकूल नहीं हैं. लक्ष्मी मित्तल जैसे लोग ब्रिटेन में जाकर बस गये हैं. लेकिन भारत में टाटा, बिड़ला, अम्बानी जैसे अनेक उद्योग समूहों ने भारत की औद्योगिक प्रगति की बागडोर सम्हाली है और निजी क्षेत्र न सिर्फ भारत बल्कि बाहर के देशों में औद्योगिक निवेश कर रहा है.

विश्व स्तर की संस्था एल.आई.ओ. ने दुनिया के धनाढ्य वर्ग के सर्वे में यह पाया कि करोड़पति लोग टैक्स प्रणाली, समाज में सुरक्षा और पढ़ाई के मामले में देश छोड़कर विदेशों में जा बसे हैं.

भारत में अभी टैक्स प्रणाली का स्थाई स्वरूप नहीं बना है. बार-बार परिवर्तन होते रहते हैं. शिक्षा में स्तरहीन विश्वविद्यालय और व्यापमं जैसी घटनायें हैं. समाज में असुरक्षा बढ़ती ही जा रही है. सड़कों पर लोग लूट लिये जाते हैं. घरों में घुस कर डकैती हो जाती है. वर्ष 2000 से 2014 तक करीब 61,000 करोड़पति भारत छोड़कर सम्पन्न देशों में जाकर बस गये हैं.
भारत को स्थाई वित्तीय नीति, सुरक्षा व सभी प्रकार की संरचना को विकसित कर देश में अवसर बनाने व देने होंगे, तभी निर्धन वर्ग का नौकरी के लिए और धनाढ्य वर्ग का अवसरों के लिए पलायन रुकेगा.

Related Posts: