प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आंतरिक सुरक्षा में साइबर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया है. काश्मीर में अलगाववादियों, पाकिस्तान से आ रहे आतंकियों और नक्सलियों से फौज और पैरा मिलीट्री पुलिस बल निपट ही रहे हैं. लेकिन देश के अंदर लूट, डकैती, चोरी, बलात्कार के अपराध भी किसी आतंकी या साइबर क्राइम से कम करके नहीं आंके जाना चाहिए. इनसे निपटना पुलिस का काम है.

ये अपराध भी समाज में आतंक और असुरक्षा को हर दर्जे तक ले जा चुके हैं. कभी देश में मध्यप्रदेश, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के कुछ जिले भिंड, मुरैना, धौलपुर, आगरा, सागर, रीवा आदि ग्रामीण परिवेश के डकैती के क्षेत्र माने जाते थे लेकिन अब यह डकैतियां चर्चा में नहीं आतीं. क्योंकि शहरों में कभी भी कहीं भी बैंकों में डाका पड़ जाता है.

बैंकों के एटीएम तोडऩे के साथ-साथ पूरी एटीएम मशीन ही उखाड़ कर ले जाते हैं. सड़कों पर दिन दहाड़े महिलाओं की चेन-पर्स खींच लेना, बसों में जेबकटी और एक्सप्रेस ट्रेनों में मुसाफिरों में लूट डकैती हो जाना इतना ज्यादा हो गया है कि अब इनकी खबरें व घटनाएं सामान्य लगने लगी हैं.

इनके अपराधी जिस दिन जेल से छूटते है उसी दिन फिर से उन्हें अपराधों में लग जाते हैं. अब जेल सजा की जगह सुविधा के बना दिये गये है. कभी जेलों में चक्की पीसना सख्त काम माना जाता था. अब जेलों में चक्कियां बंद हो गयी हैं. उसके स्थान पर अपराधियों से जेलों में जो काम लिया जाता था, उसकी उन्हें मजदूरी दी जाती है. जेल रोजगार में बदल दिये गये हैं.

ये अपराध सड़कों पर भी इतनी फुर्ती से बाइक सवारों द्वारा किये जाते हैं कि गवाह मिलने का सवाल ही नहीं है. घर से थोड़ी देर को कहीं जाने पर घर में चोरी हो जाती है. देश के अंदर ये अपराध भी लोगों में आतंक की तरह दिल दिमाग पर छा गये हैं. सभी हर वक्त भयभीत व असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

साइबर क्राइम से भी इसी तरह की असुरक्षा बढ़ी है. घर बैठे-बैठे लोगों का रुपया ए.टी.एम. से निकल जाता है. व्यक्ति भोपाल में है और उसका रुपया अहमदाबाद में कोई निकाल लेता है. ए.टी.एम., आधार आदि कार्ड की क्लोनिंग हो रही है. मध्यप्रदेश सरकार के तकनीकी शिक्षा विभाग की एक बड़ी रकम का असली चैक बैंक में इसलिए कैश नहीं हुआ कि उसे प्रिजेंट करने में पहले कोई उस चेक का क्लोन बनाकर रुपया ले जा चुका था.

अब यह महसूस किया जाने लगा है कि अपराधियों के मुकदमे सिविल केसों की तरह लंबे न चलें और कुछ दिनों में ही उनका निपटारा हो जाए. जेलों में अपराधियों को शारीरिक दंड दिया जाना चाहिये, जो दोबारा अपराध करे उसे आजन्म जेल में रखा जाए.

अदालतों को भी उस पर सोचना होगा कि हर अपराधिक मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं होता है. पुलिस को भी पाकेट विटनेस से अदालतों में गवाही की खानापूरी करनी पड़ती है. अपराधियों के मामले में अदालतों को भी व्यवहारिक परिस्थितियों के हिसाब से काम करना चाहिए. केवल प्रक्रिया मात्र से कुछ नहीं होने वाला.

देश में अपराधियों का आतंक छा चुका है. आंतरिक सुरक्षा घर, रेल, बस और सड़क पर पैदल चलने में भी खत्म हो चुकी है. फौजी और सशस्त्र पुलिस बल तो आतंकियों से निपट रहे है, लेकिन देश के अन्दर अपराधियों के आतंक, अपराध से पुलिस को ही लोगों को आंतरिक सुरक्षा देनी होगा, जो इस समय दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही है.

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