modiश्रीहरिकोटा,  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पहली स्वदेशी उपग्रह नौवहन प्रणाली(आईआरएनएसएस) के पहले चरण के लिये आवश्यक सात उपग्रहों की श्रृंखला के सातवें और आखिरी उपग्रह आईआरएनएसएस-1जी का आज यहां सफल प्रक्षेपण पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों को बधाई दी और इस प्रणाली को ‘नाविक’ नाम दिया।

श्री मोदी ने यहां स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उपग्रह के प्रक्षेपण के तुरंत बाद कहा कि उन्हें इसरो की इस उपलब्धि पर गर्व है और दुनिया के चुनींदा देशों के पास ही ऐसी प्रणाली है। उन्होंने कहा “मैं सबसे पहले इसरो के सभी वैज्ञानिकों को और उनकी पूरी टीम को हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ, उनका अभिनन्दन करता हूँ। मैं सवा सौ करोड़ देशवासियों को भी इस नए नजराने के लिए अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूँ।

अंतरिक्ष विज्ञान में भारत के वैज्ञानिकों ने अविरथ पुरुषार्थ करके अनेक सिद्धियां प्राप्त की हैं और आज देश अनुभव कर रहा है कि स्पेस साइंस के माध्यम से सामान्य मानविकी के जीवन में भी कितना बदलाव लाया जा सकता है और टेक्नोलोजी मनुष्य के जीवन में भी किस प्रकार से उपयोगी हो सकती है। भारत का अंतरिक्ष प्राैद्योगिकी के क्षेत्र में पदार्पण भारत के सामान्य मानव की जिन्दगी में बदलाव के लिए, व्यवस्था में सुधार के लिए, सुगमता के लिए एक बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।”

प्रधानमंत्री ने कहा “आज नौवहन के क्षेत्र में भारत ने अपना सातवां उपग्रह लॉन्च किया है। सातों उपग्रह, एक के बाद एक सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किये गये और इस के कारण आज भारत दुनिया के उन पाँच देशों में आज गर्व के साथ खड़ा हो गया कि जिसमें उसकी अपनी जीपीएस प्रणाली, उसका अपना नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम निर्मित हो गया है। आज तक हम जीपीएस सिस्टम के लिए अन्य देशों की व्यवस्थाओं पर निर्भर थे| आज हम आत्मनिर्भर बने हैं। हमारे रास्ते हम तय करेंगे , कैसे जाना , कहाँ जाना , कैसे पहुँचना , यह हमारी अपने टेक्नोलॉजी के माध्यम से होगा। ”

श्री मोदी ने कहा “भारत के वैज्ञानिकों ने आज 125 करोड़ देशवासियों को एक अनमोल तोहफा दिया है। हम जानते हैं कि आज के युग में जीपीएस प्रणाली का बहुत बड़ा रोल हो गया है। हमारा एक मछुआरा भी इस व्यवस्था के तहत यह जानकारी हासिल कर सकेगा कि मछलियां पकड़ने कहां जाना चाहिए। इसके लिए सबसे छोटा रास्ता कौन सा होगा। अब हमारे विमानों को अगर लैंड करना है तो बहुत सरलता से सटीक तरीके से अपनी भारतीय जीपीएस प्रणाली की मदद से वह कर पायेंगे। कहीं कोई बहुत बड़ी प्राकृतिक आपदा हो गयी, उस स्थिति में कैसे मदद पहुंचानी है, कहाँ पहुंचानी है, यह सारी व्यवस्थाएं इस भारतीय उपग्रह के द्वारा जो नयी व्यवस्था विकसित हुयी है, उससे पता चल सकेंगी।”

उन्होंने कहा “इसकी क्षमता इतनी है कि कश्मीर से कन्याकुमारी, कच्छ से कामरूप तक वह भारत के हर कोने को तो सेवा देगा ही लेकिन इसके अतिरिक्त देश से बाहर 1500 वर्ग किलोमीटर के दायरे में भी अगर कोई सेवाएं लेना चाहता है तो उसको यह सेवाएं उपलब्ध होंगी। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ के जो देश हमारे पड़ोस में हैं, वह भी अगर भारत की इस सेवा का उपयोग करना चाहते हैं तो उन्हें भी इसका लाभ मिल सकता है। वे अाज भी दुनिया के किसी न किसी देश की सेवाएं ले करके अपना काम चलाते हैं। श्री मोदी ने कहा “सदियों पहले हमारे नाविक समंदर में कूद जाते थे, सितारों के सहारे, चन्द्र और सूर्य की गति के सहारे वह अपनी राह तय करते थे और मंजिल पर पहुँचने का प्रयास करते थे।

सदियों से हमारे नाविक अनजान जगह पर पहुँचते थे और उनका सहारा हुआ करते थे, सितारे, चांद और सूर्य, जिनके सहारे वह अपने रास्ते तय करते थे। अब विज्ञान की मदद से हम इस उपग्रह और प्रौद्योगिकी के माध्यम से इस काम को करने जा रहे हैं।” प्रधानमंत्री ने कहा कि इस व्यवस्था को मैं देश के करोड़ों मछुआरों की सदियों पुरानी परम्पराओं को आदर्श मानते हुए उन्हें यह पूरी व्यवस्था समर्पित करने के इरादे से आज इसे ‘नाविक’ नाम दिया जाता है और ‘नाविक’ नाम से अब यह सेवा उपलब्ध होगी| यह हमारा अपना नाविक होगा|

हमारे मोबाइल फोन में हमारा नाविक होगा। जो नाविक हमें, हम कहाँ हैं, उसका पता दे सकता है , कहाँ जाना है, उसका रास्ता दे सकता है और कहाँ पहुँचना है , उसका भी हमें वह नाविक रास्ता दिखाएगा और जब मैं नाविक की बात कर रहा हूँ तो, टेक्नोलोजी की भाषा में अगर मुझे कहना है तो मैं कहूँगा कि नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम जिस नैविगेशन विद इंडियन कंस्टेलेशन के रूप में मैं आपके सामने समर्पित करता हूँ।”

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