कहने को तो यह कहा जा सकता है कि दिल्ली में आतंकी साजिश नाकाम कर दी गयी, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि दिल्ली या देश पर से आतंकी साजिश या हमला खत्म हो गया. ये पकड़ में आ गये- तो टल गया. संसद पर हमला करने वाले या मुम्बई में लोकल ट्रेन व ताज-ओबेराय-ट्रीडेंट होटलों पर हमला करने वाले पकड़ में नहीं आ सके और साजिश काम कर गयी.

दिल्ली में अभी जो पकड़े गये हैं उनके नाम साजिद, शाकिर और समीर हैं. लेकिन इस साजिश में ये ही सिर्फ तीन हैं- ऐसा भी नहीं है. जो इनके मददगार हैं, ये जिन घरों में हैं या जिनके साथ ठहरे हैं वे भी इस देश के लिये इसी दर्जे के आतंकी और मुल्क में आस्तीन के सांप हैं जिन्हें ‘ट्रोजन हार्सÓ भी कहा जा सकता है. संसद पर हमला करने आए चारों आतंकी हमलावर पाकिस्तानी थे, लेकिन ये जामा मस्जिद एरिया से कार में संसद तक आये, जिन्होंने उन्हें ठहराया हर तरह से मदद की वे भी तो संसद पर हमले के उतने ही दोषी हैं और मुल्क के लिये खतरनाक हैं जो न तो अभी तक पकड़े गये हैं और न ही मारे गये.

हो सकता है कि ये साजिद, शाकिर और समीर उनके मददगार रहे हों. यहां जो भी आतंकी है या जो पाकिस्तान से आ रहे हैं वे केवल उतने ही नहीं हैं जितने पकड़ में आ जाते हैं- इस यथार्थ व तथ्य को राष्टï्र को न सिर्फ नजरअंदाज करना चाहिए बल्कि सही हमले के लिए उन तक पहुंचना ही जड़ में पहुंचना होगा. राष्टï्र की सलामती इसी में है कि इन्हें जड़ से खोद दें. काश्मीर में आतंकवाद तो इसलिए नजर आता है कि उसकी सीमा पाकिस्तान से लगी है- वहां से वे आते हैं और भारतीय के अलगाववादियों को पूरी हर तरह से मदद करते हैं. लेकिन मध्यप्रदेश तो देश के मध्य में पाकिस्तान से काफी दूर है. यहां के ‘सिमीÓ के लोग क्या हैं. वे भी उतने ही भारत विरोधी और गद्दार हैं जितने सीमा पर बसे राज्यों के अलगाववादी.

एक सिमी के आतंकी ने पकड़े जाने पर भोपाल में ही पुलिस जांच-पड़ताल में यह कहा कि ‘जमातो में तो तकरीरें होती हैं- उन्हें सुनने के बाद कौन हिन्दुस्तान को मोहब्बत कर सकता है.Ó इनके इस देश को यो सरकार को अब ‘जमातोÓ के बारे में और क्या जानने का बाकी रह जाता है. यह मानना भी एक मुगालता ही होगा कि भारत में इस्लामी आतंकवाद केवल काश्मीर की वजह से काश्मीर तक ही सीमित है. यह भारतव्यापी है. दक्षिण में तमिलनाडु के कोयम्बटूर, महाराष्टï्र में मुम्बई और पुणे, मध्यप्रदेश में खंडवा, बुरहानपुर, उत्तरप्रदेश में वाराणसी व अयोध्या, दिल्ली पठानकोट- कब, कहां हो गया और हो जाए, उसका क्या कहा जा सकता है. यह धारणा भी बिल्कुल गलत है कि जहां हमले हो गये वह पुलिस की विफलता या नाकामी थी.

इस देश में 19 करोड़ मुसलमानों की आबादी है और पाकिस्तान में 17 करोड़ मुसलमान आबादी है- यहां, वहां से 2 करोड़ ज्यादा हैं. क्या इतनी बड़ी आबादी में किसी पुलिस, सरकार या राष्ट्र के लिए संभव है कि वह 19 करोड़ मुसलमानों से यह छांटे-बीने कि कौन आतंकी है और कौन नहीं. यह सच है कि भारत का हर मुसलमान आतंकी नहीं है, लेकिन जो पकड़े जा रहे हैं वे मुसलमान हैं- जो आज नहीं है वह कल क्या होगा, इसका क्या कहा जा सकता है.

इस समय राष्टï्र की सुरक्षा की दृष्टिï से यह सबसे अहम प्रश्न है कि इतनी बड़ी आबादी में जहां आज यह माहौल चल रहा है उसमें राष्ट्र की हिफाजत कैसे की जाए. सवाल जात का या धर्म का नहीं रह गया है.