मार्च की वर्षा वास्तव में कई आपदाओं की वर्षा हो गई है. इसमें केवल फसल या किसान ही तबाह नहीं हुआ बल्कि इसका दूरगामी प्रभाव अगली फसलों के आने तक बढ़ता हुआ बना रहेगा.

कारण निश्चित ही प्राकृतिक है. आत्म-आलोचना में विश्व समाज अपने आपको वैश्विक उष्मता बढ़ाने का पापी-दोषी मानकर भी विवेचना कर रहा है. भारत के केवल उत्तरी इलाके हिमपात के राज्य है. वे इस साल बार बार के हिमपात से मुसीबत में आ गये. वही रूस, यूरोप के उत्तरी राष्टï्र और कनाडा और अमेरिका भारी हिमपात और बर्फीले तूफान से नष्टï हो रहे हैं. प्रशान्त महासागर में तूफान लगातार तूफान मचाये हुए है. ऐसा ही एक तूफान 340 प्रति किलोमीटर हवा की रफ्तार से आया बनातू नाम का द्वीप राष्टï्र पूरी तरह तबाह हो गया. सब कुछ उड़ा-गिरा दिया.

दुनिया में अंतरराष्टï्रीय और विश्व स्तरीय जलवायु पर शिखर सम्मेलन होते जा रहे हैं. कई नाम भी रियो चार्टर- क्वेटो संधि आदि भी सामने आ चुके हैं लेकिन मौसम की विध्वंसता दुनिया भर मेें बढ़ती ही जा रही है. अब तो यह अंदेशा भी होने लगा है कि जब तक सम्हलेंगे, समझेंगे और कुछ करना चाहेंगे तब बहुत कुछ मौसम की मार से तबाह हो चुका होगा.

मौसम के संबध में अभी केवल इतनी वैज्ञानिक प्रगति हुई है कि कुछ हद तक उनकी पूर्व सूचना मिल पाती है. भूकम्प पैदा होने की जगह और गहराई नापी जा रही है और तूफानों में हवाओं की रफ्तार का पता चल जाता है. लेकिन इन्हें रोका-तोड़ा या मार्ग-दिशा परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. इनकी चेतावनी केवल इतना ही अर्थ रखती है कि उस इलाके से जितना दूर जा सकते हैं- चले जायें. किसी भी ‘हाई अलर्टÓ का प्राकृतिक आपदा पर तो कोई असर हो नहीं सकता.
भारत में इस मार्च की बरसात ने खेतों में कटने और बिकने के लिये तैयार फसलों को नष्ट कर दिया. सब्जियां किचन के बजाय कीचड़ में दफन हो गईं. गेहूं की गुणवत्ता, चमक व मिलने वाला भाव सभी कुछ वर्षा में बह गया. इससे खाद्यान्न महंगाई बढ़ेगी और उसी पर जीवन आधारित होता है. लिहाजा अन्य सभी वस्तुओं की महंगाई दर बढ़ती जाएगी. मार्च में गर्मी पड़ती थी, लेकिन इस बेमौसम बरसात, ओला और आंधी ने देश की पूरी अर्थ-व्यवस्था को ही ठंडा कर दिया.

इतने बड़े पैमाने पर पूरे राष्ट्र व हर राज्य में किसानों को मुआवजा देने के साथ सभी कृषि वस्तुओं बीज, खाद आदि में भी सहारा देते रहना पड़ेगा.
इतने बड़े खर्च के कारण कई विकास योजनाओं को भी रोककर रुपया इधर देना होगा. किसान कुछ तो सम्हल पायेगा, लेकिन जिस पैमाने पर अनाज का नुकसान हो गया है यह तो राष्ट्रीय घाटा (नेशनल लॉस) है. उसे पूरे राष्ट्र को झेलना पड़ेगा.

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