भारत पर इन दिनों आयात का संकट दोहरी मार के साथ आया है. हमारा आयात रिकार्ड स्तर पर बढ़ता जा रहा है और निर्यात रिकार्ड स्तर पर घटता जा रहा है. इसका सीधा-सीधा असर भारत के विदेशी मुद्राकोष और रुपये की कीमत पर पड़ रहा है. एक लम्बे अर्से से रिजर्व बैंक खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्यों और खाद्यान्न मुद्रास्फीति के आधार पर ब्याज दरों को काफी ऊंची रखे हुए है. इसमें औद्योगिक मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर में काफी गिरावट पून्जी की कमी है और ये महंगी पून्जी से निर्मित माल की लागत बढऩे से विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा में भारतीय निर्यात काफी कमजोर रहा. गत मई माह में इसमें 29 प्रतिशत की रिकार्ड गिरावट भी दर्ज की गयी थी.

ऐसे ही अवसर आयात में भी रिकार्ड वृद्धि होने से भी विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. हम आज तक गेहूं में सरप्लस चल रहे थे. विदेशों को निर्यात भी करते रहे, लेकिन इस वर्ष रबी मौसम में फसलों के पकने के समय ही बेमौसम बरसात आ जाने से गेहूं की फसल काफी कम हो गयी और मंडियों व बिक्री केन्द्रों पर उसकी क्वालिटी इतनी गिरी हुई थी कि उसे केन्द्र सरकार के निर्धारित नियमों के तहत समर्थन मूल्य पर खरीदा ही नहीं जा सकता है. सभी राज्यों ने केन्द्र से गुहार लगाई कि गेहूं खरीदी में क्वालिटी का नियम शिथिल किया जाए और ऐसा हो जाने पर ही उस गेहूं को खरीदा गया. किसानों को पूरा घाटा न हो इसलिए सरकार ने यह गेहूं खरीद तो लिया लेकिन इसे अब बेचा नहीं जा सकता- कोई उसे लेगा नहीं. इसे सिर्फ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खपाया जायेगा. हर साल यह सिलसिला चल रहा था कि केंद्र व राज्य सरकारें गेहूँ व चावल को सार्वजनिक वितरण के अलावा बड़े खरीददारों आटा मिलों, खाद्यान्न सामान बनाने वाले कारखाने खरीदते थे. इस बार आटा मिलों व खाद्यान्न कारखानों ने गिरी क्वालिटी के गेहूँ को उनके काम के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त मान कर खरीदने से इंकार कर दिया है.

इन सभी बड़े खरीददारों ने विदेशों आस्ट्रेलिया, यूक्रेन, फ्रांस व कनाडा से गेहूँ का आयात शुरू कर दिया है इस समय यह स्थिति बन गयी है कि अभी तक हम गेहूँ का निर्यात कर रहे थे अब वह आयात हो गया. शक्कर की विदेशी मांग न होने से उसका निर्यात भी बंद पड़ा है. आटा मिलों ने और निर्माण… व्यापारियों ने मार्च से 5 लाख टन प्रीमियम आस्ट्रेलियाई गेहूँ आयात के लिए सौदे किये हैं जबकि घरेलू बाजार में क्वालिटी में गिरा गेहूँ का सरप्लस स्टाक केंद्र व राज्य सरकारों के पास पड़ा है उसका कोई लेवाल नहीं है. यह पिछले एक दशक की गेहूँ की सबसे बड़ी आयात खरीदी होगी. अब तक जितने गेहूँ के सौदे हुए हैं उनमें से करीब आधा भारत पहुंच चुका है और शेष गेहूँ की डिलेवरी जुलाई में होनी है. यह गेहूँ 255 से 275 डालर प्रति टन खरीदा जा रहा है.

बेमौसम बरसात ने भारत की न सिर्फ खेती बल्कि अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया. किसानों ने तो गुहार लगाकर किसी काम का न रहा गेहूँ सरकार को बेच दिया और सरकार के पास वह बेकार ही पड़ा रहेगा और फिक जायेगा. सरकारी रुपया भी किसानों के प्रति दया भाव की खरीदी में बरबाद होने जा रहा है.
दालों का 40 प्रतिशत का अभाव तो चल ही रहा था. फसलें खराब होने से वह 60 प्रतिशत हो गया और इस साल 5 हजार टन दालों का अतिरिक्त आयात हो रहा है. खरीफ फसल से ही उम्मीद है कि स्थिति में कुछ सुधार आए.

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