आरक्षण ही खतरे में आ गया है और उसे रक्षण की जरूरत हो रही है. जिन दलित आदिवासी वर्र्गों के लिये इसकी संविधान में डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण कराया था. उन पर दूसरे वर्ग इतने ज्यादा हावी और काबिज हो गये कि मूल आरक्षण वर्ग ही संकट में आ गया है. अब दलित वर्ग यह मांग कर रहा है कि आरक्षण में जो दीगर वर्ग घुस बैठे हैं, उन्हें आरक्षण से बाहर किया जाए. आरक्षण में धंसने वालों की वर्ग या जातियां इसमें लगातार बढ़ती ही जा रही है. उनमें से अधिकांश ऐसी हैं जो दलित वर्ग न होकर संपन्न वर्ग के लोग है और जिन्होंने जातिप्रथा के नाम दलितों व खासकर जिन्हें ‘अछूत’ माना जाता था उन्हें अनन्त काल से अमानवीय तरीके से प्रताडि़त करते रहे हैं. अब आरक्षण में पात्रता रखने वाले पर अपात्र लोग छा गये हैं.

यू.पी.ए. और अभी के एन.डी.ए. शासन काल में गुर्जरों ने मुंबई-दिल्ली रेल खंड कर महीनों रेल यातायात बाधित कर आरक्षण हासिल कर लिया. इससे देश में एक लहर ये उठ गयी है कि हर जाति उनके लिये आरक्षण मांग रही है.
राजस्थान व अन्य राज्यों के गुर्जर संपन्न वर्ग के किसान है. इन्होंने इस प्रतिस्पर्धा में आरक्षण मांगा क्योंकि ‘मीणाÓ जाति को आरक्षण दिया था. अब गुर्जरों को आरक्षण मिल गया तो गुजरात में पाटीदार (पटेल) वर्ग आरक्षण की मांग कर संघर्ष व आंदोलन पर उतर आया. ये वर्ग भी संपन्न किसान वर्ग में आता है. इसके साथ ही मध्यप्रदेश में रघुवंशी भी आरक्षण मांगने लगे है. ये वर्ग भी संपन्न किसानों का वर्ग है. मध्यप्रदेश में इनके बारे में यह मान्यता है कि अच्छी जमीन याने रघुवंशी की जमीन है. यदि हर जाति ने आरक्षण पर गुर्जरों की तरह हिंसक व रेल रोको आन्दोलन चलाये तो देश में सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त होकर अराजकता की स्थिति बन जायेगी.

गुजरात में पटेल समाज हार्दिक पटेल के नेतृत्व में संगठित हो गया है और अधिक आरक्षण का विरोध करने के लिये आरक्षित दलित वर्ग की जाति से गुजरात में अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व में रैलियों के जरिये एक-दूसरे का विरोध करने व मोर्चा जमाने के लिये आगे आ गये हैं. गुजरात में आरक्षण मांगने पर इनके विरोध करने के लिये जाति संघर्ष की स्थिति बन गयी है और यह निश्चित ही बहुत जल्दी ही पूरे देश में फैल जायेगी. आरक्षण की समाज में बाढ़ आ गयी है और इसी बाढ़ में मूल आरक्षण ही डूब जायेगा और पूरे देश में जातीय संघर्ष या जातीय दंगों की स्थिति बन जायेगी. विभिन्न जातियों के होते हुए भी अभी समाज आपस में गुथा हुआ है. सभी एक-दूसरे से धंधा-रोजगार व कामों से जुड़े हैं. इसमें ऐसा बिखराव व अलगाव आयेगा कि भारत की समाज व्यवस्था ही टूट सकती है.

इसका एकमात्र निदान है कि डाक्टर अम्बेडकर ने संविधान में जिन ‘अछूतÓ जातियों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की थी आरक्षण वहीं तक रखा जाये. इनमें जो प्रतिशत बढ़ा दिया गया वह भी इन्हीं को दिया जाए. प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ‘ओबीसीÓ के नाम पर जो आरक्षण की व्यवस्था की उसे फौरन खत्म कर सभी ओबीसी जातियों को आरक्षण से बाहर किया जाए और गुर्जर आरक्षण तत्काल प्रभाव से रद्द
होना चाहिए.

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