दिल्ली, देश और सच कहें तो दुनिया एक ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का गवाह बनने जा रही है जो अभूतपूर्व है। यहां आर्ट ऑफ लिविंग के वल्र्ड कल्चर फेस्ट की बात की जा रही है। आर्ट ऑफ लिविंग का ये महाआयोजन दिल्ली में यमुना के किनारे 11 से 13 मार्च तक हो रहा है। जिसमें शरीक होने के लिए बड़े दिग्गज आ रहे हैं। इन दिग्गजों में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सरकार के आधा दर्जन मंत्री और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं।

आर्ट ऑफ लिविंग का कहना है कि जितनी बड़ी संख्या में लोग इसमें शरीक होंगे उसके लिए 1000 एकड़ जमीन की जरूरत होगी। इसके लिए बनाया गया सेट ही सिर्फ 7 एकड़ में है। और इसके लिए यमुना के किनारे के अलावा और कोई जगह नहीं हो सकती। इस फेस्टीवल में 25000 से ज्यादा कलाकार परर्फाम करेंगे जिनमें पूरी दुनियां से आए 8000 संगीतकार होंगे। फेस्टीवल के तीनों दिन आर्ट ऑफ लिविंगआर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर लोगों को पीस मेडीटेशन भी कराएंगे। कुल मिलाकर 3 दिनों तक वैदिक मंत्रों के साथ यहां संगीत और संस्कृति की धुन भी गूंजेगी।

ये आयोजन तो शानदार है लेकिन इसको लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। यमुना किनारे लाखों का जमावड़ा हो रहा है तो यमुना के इकोसिस्टम को खतरा है। साथ ही यमुना किनारे खेती करने वाले किसान तो जैसे तबाह हो गए हैं। सियाराम अपने उजाड़ हुए खेत को देख रहा है। उसकी खड़ी फसल पर बुलडोजर चल गए। दिल्ली में यमुना के किनारे उसके खेत से महज कुछ मीटर दूर आर्ट ऑफ लिविंग के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल की तैयारी चल रही है। सियाराम के जिस खेत पर कभी फसल खड़ी थी अब फेस्टिवल में आई कारें खड़ी होंगी।

यहां पार्किंग बनेगी। कार्यक्रम तो सरकारी जमीन पर हो रहा है लेकिन इसकी पार्किंग, और रास्ते के लिए खेतों को उजाड़ा गया है। किसान बताते हैं कि आर्ट ऑफ लिविंग ने फसल बर्बाद होने पर 4000 रुपये प्रति बीघा मुआवजा देने का वादा किया है जबकि बरबाद हुई फसल की कीमत 40-50 हजार रुपये प्रति बीघा है। इस आयोजन से 250 किसान परिवार प्रभावित हो रहे हैं।

मामला सिर्फ किसानों का नहीं है। यमुना के इको सिस्टम के तबाह होने का भी डर है। एनजीटी भी इसपर सवाल उठा चुका है। वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल में 3 दिन तक बड़ी आध्यात्मिक बातें होंगी और जीने की कला सिखाई जाएगी। मगर इन किसानों को जीने की कला से ज्यादा जीने के लिए रोटी की जरूरत है और वे नहीं जानते हैं फसल को हुए नुकसान की भरपायी कौन करेगा।