केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने वर्ष 2016-17 का आर्थिक सर्वे तथा वर्ष 2017-18 के अनुमानों को संसद में प्रस्तुत किया. सर्वे के महत्वपूर्ण आंकलन में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर वर्ष 2016-17 में 6.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि वर्ष 15-16 में यह 7.6 प्रतिशत और वर्ष 14-15 में 7.2 प्रतिशत दर्ज हुई थी अर्थात् पूर्व वर्ष की तुलना में जीडीपी में लगभग 1.1 प्रतिशत की गिरावट.

भारत जैसे विशाल अर्थव्यवस्था वाले देश में जीडीपी में यह गिरावट चिन्ताजनक मायने रखती है. सर्वे का निष्कर्ष पांच बिन्दुओं पर निकाला जा सकता है. पहला- नोटबंदी से खेती पर प्रतिकूल प्रभाव, अचल संपत्ति (रियल एस्टेट) क्षेत्र में गिरावट, कच्चे खनिज तेल के दामों में बढ़ोतरी की आशंका और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, नगदी संकट से पार पाने की आशा और रोजगार सृजन के अवसरों
में बढ़ोतरी.

देश के कृषि क्षेत्र ने रबी बोवनी में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज कराई है. कुछ स्थानों पर मौसम के प्रतिकूल प्रभाव पाला, ओलावृष्टि आदि को छोड़ दें तो कृषि उत्पादन रिकार्ड रहने की संभावना है किन्तु इस क्षेत्र की स्थिति खराब होने की आशंका बताती है नोटबंदी ने किस सीमा तक अन्नदाता किसान को प्रभावित किया है. देश की 58 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है. इंद्रदेवता के बाद अन्नदाता किसान ही देश का ‘वास्तविक वित्तमंत्रीÓ है.

सरकार ने नोटबंदी का फैसला करते समय अन्नदाता की परेशानी और कृषि क्षेत्र पर आशंकित प्रभाव का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा. अंतत: इसका असर जीडीपी वृद्धि दर पर आशंकित है.

अचल संपत्ति क्षेत्र में दाम गिरने और मध्यम वर्ग को सस्ते मकान मिलने की संभावना सर्वे में है किन्तु सरकार यह भूली है कि एक मकान बनने से 213 उद्योगों को कार्य मिलता है, रोजगार सृजन होता है. सस्ते मकान के लिए सरकार पंजीयन शुल्क कम करने जैसा कदम उठाने की सलाह राज्यों को दे सकती है.

कच्चे तेल के भाव में वृद्धि का असर किसी झरने के पानी की तरह अर्थव्यवस्था पर होगा. ऐसे में अगले वित्तीय वर्ष में जीडीपी दर 6.75 से 7.5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान भी खतरे में आ सकता है. यह भी चिन्ताजनक संकेत हैं. सर्वे में नगदी संकट अप्रैल तक हल होने का अनुमान है किन्तु आमजन नोटबंदी के बाद मौसम के मिजाज की तरह सामने आये आरबीआई के दिशा-निर्देशों के चलते अभी भी विश्वास करने की हालत में नहीं है.

वर्ष 2017-18 में नौकरियों के अवसर बढऩे की संभावना जताई गई है, किन्तु केवल रोजगार मेलों से इन अवसरों का सृजन संभव होता नहीं लगता. पूंजीगत निवेश और व्यवसाय विस्तार के साथ रोजगार सृजन के अवसर उतने साफ तौर पर सर्वे में दिखाई नहीं देते.

आर्थिक समीक्षा से लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर फूल गुलाबी (रोजी) नहीं लगती. पिछले महीनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत के जीडीपी दर में गिरावट की आशंका जताई थी.

सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई है. हर सरकार आर्थिक प्रगति के संदर्भ में आशावादी होती है, होना भी चाहिए क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है किन्तु इस उम्मीद का आधार वास्तविक आंकलन पर आधारित होना चाहिए. सरकार ऐसी सभी खामियों को आगामी वित्तीय वर्ष में दूर करने का प्रयास करेगी- यह अपेक्षा की जानी चाहिए.

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