-प्रफुल्ल माहेश्वरी

भारत में मनाए जाने वाले हर पर्व की अपनी विशेषताएं हैं. हर पर्व के अपने-अपने संदेश भी हैं. उनका अपना दर्शन भी है और इनकी ‘गंगोत्रियों’ में पौराणिक कथाओं के साथ जीवन में मूल्यों को सदा साथ रखने की नसीहत भी होती है.

होली का त्यौहार- आशा, विश्वास, उमंग, उल्लास और उत्साह तथा मस्ती का पर्व है. ऋतु परिवर्तन के साथ ही जीवन की नियमित शैली से थोड़ा हटकर मस्ती को आत्मसात किया जाता है ताकि हम दुगुने आत्मविश्वास के साथ पुन: अपने लक्ष्यों की ओर जुट जाएं.

होली का एक और अहम संदेश है- बुराइयों और कुविचारों का दहन करना. वह बुराइयां- व्यक्ति, समाज और व्यवस्था, सभी में हो सकती है. हर स्तर पर इनका दहन भी आवश्यक है अन्यथा राष्ट्र के एक दौर को ये बुरी तरह से प्रभावित कर देती हैं.

जहां तक वर्तमान दौर का सवाल है- हम कुछ बुराइयों की जकड़ में इस तरह आ चुके हैं जो न केवल हमारा और हमारे समूचे तंत्र और राष्ट्र का वर्तमान बिगाड़ रही हैं अपितु भविष्य के लिए भी बड़े प्रश्नचिन्ह खड़े कर रही हैं. भ्रष्टाचार ने इकाई से लेकर तंत्र तक सभी को जकड़ रखा है.

हमारे देश और प्रदेश की जितनी प्रगति है- सभी को भ्रष्टाचार खाता जा रहा है. नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद सम्हालने के बाद कहा था कि ना खाऊंगा न खाने दूंगा! लेकिन प्रशासन से लेकर राजनीतिक तंत्र तक भ्रष्टाचार का जो बोलबाला बढ़ रहा है उससे ये प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री के निर्देश से भी कोई सबक नहीं ले पा रहा है. विजय माल्या, ललित मोदी, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विक्रम-राहुल कोठारी और इनके जैसे अन्य उदाहरण हमारे तंत्र में दीमक की तरह फैले भ्रष्टाचार की पोल उजागर कर रहे हैं. यह तय है कि बड़े बैंक अधिकारियों की संलिप्तता के बिना इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के ये कांड संभव नहीं थे.

बड़े स्तर पर गहराई से जांच होनी चाहिए और इन्हें सजा भी मिलनी चाहिए. ये भ्रष्टाचार इसलिये ज्यादा खतरनाक है क्योंकि इससे आम आदमी का सिस्टम से भरोसा उठ रहा है. अनेक बार यह देखने में आता है कि आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसे बड़े अधिकारी तो बच निकलते हैं और क्लर्क और इंजीनियर जैसे कर्मचारी फंसते जाते हैं. सिस्टम में पोल उजागर होने के बाद बैंकों की कार्य प्रणाली को और बेहतर बनाने के लिए नए कानून लाए गए हैं, लेकिन उसमें भी सजा और जुर्माने के दायरे में उनको भी लाना चाहिए जो बड़े स्तर पर जिम्मेदार हैं!

सरकारी तंत्र भी भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तविक लड़ाई अभी नहीं लड़ पा रहा है. जांच में ही कई साल निकल जाते हैं. सरकारों को अब यह सोचना होगा कि जनता अब भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने वाली नहीं है और आगामी चुनावों में यह एक बड़ा फेक्टर बनकर सामने आने वाला है.

सरकारें भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी कदम उठाएं- वह हर स्तर से जनता के बीच पहुंचना चाहिए. समाज को भी इस बुराई के खिलाफ आगे आना होगा. रिश्वतखोरों और भ्रष्टाचारियो का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए. समाज के सामने जाने से पहले उनमें लज्जा का भाव होना चाहिए. लेकिन ऐसा इन दिनों हो नहीं रहा है.

जातिगत आरक्षण की बढ़ती मांग भी हमारे राष्ट्र के सामने चिंता का प्रमुख विषय है. यह एक तरह का समाज में फैल रहा ‘नशा’ है. लोग- इन भावनाओं की ‘आग’ फैला रहे हैं. यह ठीक नहीं है. शराबबंदी से पहले हमें इस तरह वाली ‘नशाबंदी’ करनी होगी. ये और इस तरह की अन्य बुराइयों का दहन कर हम उत्साह से रंगों का यह पर्व मनाएं. होली के शुभ अवसर पर सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं!!!

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