उत्तराखंड में उलझन संसदीय है. उसकी संवैधानिक तात्कालिक व्यवस्था की गयी और मामला अंतिम तौर व संवैधानिक प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट को करना है जिसकी प्रक्रिया चल रही है. कुछ दिनों पूर्व राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अपने संबोधन में कहा था कि संविधान के तीनों अंगों कार्यपालिका, न्यायपालिका और संसदीय संस्थाओं को अपने दायरे में रहकर काम करना चाहिए और इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि एक दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल न हो पाये.

लेकिन उत्तराखंड में इस प्रकार की उलझन नहीं है. वहां के निष्कासित विधायक उनके निष्कासन को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट आ गये है. उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक निर्णय के विरुद्ध केंद्र सरकार भी सुप्रीम कोर्ट में आयी हुई है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है जब किसी हाईकोर्ट निर्णय के विरुद्ध अपील की जाती है तो ऊपरी अदालतें सुप्रीम कोर्ट सुनवाई तक नीचे के फैसले पर स्थगन दे देता है.

उत्तराखंड का पूरा विवाद विधानसभा के स्पीकर के कारण पैदा और उलझा हुआ है. उन्होंने दो मामलों पर जो आचरण किया वही प्रक्रिया को लेकर इतना उलझ
गया है.
इसे संविधान में की कमी (लेकूना) मान जाए और इसकी प्रक्रिया या तो स्पीकर्स कान्फ्रेंस के दिशा निर्देश से तय करें या कोई संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया अपनायी जाए.

जिस समय उत्तराखंड विधानसभा में बजट पर मतदान हुआ उसी समय सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के 9 विधायक मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत से बागी होकर बजट के विरुद्ध मतदान कर दिया. इससे सदन की दलगत संख्या को देखते हुए जाहिर तौर पर बजट गिर गया था. लेकिन स्पीकर ने ध्वनि मत के आधार पर उनके विवेक से बजट को बहुमत से पारित घोषित किया. इस पर विपक्ष व बागी विधायकों ने ‘डिवीजन’ से मतदान की मांग की. डिवीजन की मांग को माना ही जाता है, जिसमें विधायक लाबी में पक्ष या विपक्ष में अपने हस्ताक्षर से मतदान करते है.

लेकिन स्पीकर ने डिवीजन की मांग जो मानी ही जाती थी- नहीं मानी और सदन स्थगित कर दिया. जाहिर है कि स्पीकर श्री रावत सरकार को गिरने नहीं देना चाहते है और इसके लिये उन्होंने स्थापित संसदीय प्रक्रिया से हटकर आचरण कर दिया. बजट के बारे में ऐसी अजीब स्थिति पहले कभी कही भी पैदा नहीं हुई. इससे आगे बढ़कर उन 9 बागी विधायकों को दल बदल कानून के अंतर्गत उनकी सदस्यता समाप्त कर दी. प्रक्रिया यह है कि विधायकों को नोटिस दिया जाता है उसका जवाब आता है उन्हें सुना जाता है फिर उनकी सदस्यता रद्द की जाती है.

यहां नोटिस तो दिया और बिना सुने उनकी सदस्यता रद्द कर दी. यहां संवैधानिक उलझन यह है कि बजट पर निर्णय विधानसभा की अंदरूनी कार्यवाही है. इसलिए बजट पास हुआ या नहीं इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. लेकिन दल-बदल एक कानून के तहत किया गया स्पीकर का कार्य है. इसलिये उसे चुनौती दी जा सकती है और वह दी गयी है. विधायकों का यही कहना है कि उन्हें सुनने का अवसर न देकर स्पीकर ने कानून का पालन नहीं किया इसलिए उनकी सदस्यता रद्द करना अवैध है.

दूसरी ओर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को विश्वासमत प्राप्त करने के लिये एक दिन निश्चित किया और उससे एक दिन पहले राष्टï्रपति को रावत सरकार भंग कर राष्टï्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर दी. राष्टï्रपति ने राष्टï्रपति शासन भी लगाया और जिस बजट को स्पीकर पास घोषित कर चुके है उसे पारित न मान उसे एक अध्यादेश से पारित किया. उत्तराखंड के नैनीताल स्थित हाईकोर्ट ने राष्टï्रपति शासन को अवैध करार देकर रावत सरकार बहाल कर दी और राष्टï्रपति शासन हटा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्णय पर स्टे देकर राष्टï्रपति शासन को फिर बहाल कर दिया और रावत सरकार कुछ ही घंटों में फिर हट गयी.

दल बदल कानूनों में राजनैतिक दृष्टिïकोण से स्पीकर बड़ी धांधली करते है. उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के कुछ विधायकों ने दल बदल किया. वहां स्पीकर ने एक लंबी अवधि में जवाब देने को नोटिस भेजा और उनका मामला महीनों प्रक्रियाओं में लटका रहा. मामला हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक गया. लेकिन उत्तराखंड में नोटिस दिया और बिना पूरी प्रक्रिया अपनाये उनकी सदस्यता समाप्त कर दी. अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है. और इस बार वे निर्णय व प्रक्रिया तय कर दे. जिसके तहत स्पीकर सभी जगहों पर ऐसी परिस्थितियों में एक-सा काम व व्यवस्था करेंगे.

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