केन्द्र सरकार की कृषि एवं खाद्य के संबंध में नीतियों में विरोधाभास चल रहा है, जिसके कारण कृषि की लागत व उपभोक्ता के लिये खाद्यान्नों के भाव निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं. दूसरी ओर रिजर्व बैंक इस खाद्यान्न मूल्य वृद्धि को खाद्यान्न भावों में मुद्रास्फीति मानकर मौद्रिक समीक्षा में पून्जी प्रदाय पर बैंक की ब्याज दरें नहीं घटाता है. इससे गैर कृषि का उद्योग-व्यापार क्षेत्र को पून्जी महंगी और निवेश कम हो जाता है.

केन्द्र व राज्य सरकारें कहती तो यही जा रही हैं कि खेती को लाभ का धंधा बनाना है. इसके लिये जरूरी है कि कृषि की लागत कम की जाए और खाद्यान्नों के मूल्य भी स्थिर रहें ताकि रिजर्व बैंक उसे खाद्यान्नों में मुद्रास्फीति न माने.
कृषि ही एकमात्र ऐसा धंधा है जिसमें इसका संचालक किसान परम्परा से अपना श्रम मूल्यांकन (लेबर चार्ज) नहीं देखता- जोड़ता है. उसे सिर्फ लगान, खाद, बीज और कीटनाशकों के भाव, खेतिहर मजदूर को निंदाई, गुड़ाई व फसल कटाई की मजदूरी ही लागत नजर आती है जबकि उद्योग-व्यापार जगत में इसके संचालक खर्चे में अपना वेतन व अन्य खर्चा भी वैधानिक रूप से जोड़कर व्यापार वस्तु की लागत व कीमत निर्धारित करते हैं.

कृषि क्षेत्र में सरकार एक ओर हर साल फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करके किसानों को ज्यादा रुपया देती है और दूसरी ओर रासायनिक खाद, कीटनाशकों, बीज, कृषि उपकरणों में सरकारी सब्सिडी कम कर भाव बढ़ा देती है. हो यह रहा है कि समर्थन मूल्य में दिया रुपया सब्सिडी कम करके वापस ले लिया जाता है. किसान के लिये यह स्थिति हो जाती है कि इधर से मिला और उधर चला गया. इसी नीतिगत द्वंद के चलते यदि कृषि पर कोई प्राकृतिक आपदा आ गयी तो किसान नुकसान से बरबाद और सरकार मुआवजा देने में हैरान हो जाती है.
सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से यूरिया को छोड़कर अन्य सभी उर्वरकों पर सब्सिडी देने के अलावा अन्य नियंत्रण समाप्त कर दिये. अब केंद्र सरकार ने फास्फेट तथा पोटाश उर्वरकों पर सब्सिडी घटा दी है और वर्ष 16-17 के लिये सब्सिडी की नयी दरें घटी दर पर तय की हैं.

नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम व सल्फर पर सब्सिडी घटाई गई है. इन उर्वरकों पर इनमें शामिल पोषक तत्वों की मात्रा के आधार पर सब्सिडी दी जाती है जिसे तय करने में अंतरराष्टï्रीय तथा घरेलू बाजार में इनकी कीमतों के अलावा डालर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर तथा देश में इनके मौजूद भंडार को भी ध्यान में रखा जाता है. सरकार की ओर से सब्सिडी घटाने पर कहा गया है कि अंतरराष्टï्रीय उर्वरकों की कीमत में आई गिरावट के मद्देनजर सब्सिडी कम की गयी है.

केन्द्र सरकार को रिजर्व बैंक से भी यह कहना चाहिए कि खाद्यान्न मूल्यों के बढऩे को केवल मुद्रास्फीति न माना जाए बल्कि पूरी कृषि अर्थ-व्यवस्था का आंकलन होना चाहिए. रिजर्व बैंक को अपनी मौद्रिक समीक्षा खाद्यान्नों के मूल्य तक ही सीमित न रखकर देश के सभी क्षेत्रों की अर्थ-व्यवस्थाओं की स्थिति का भी आंकलन करना चाहिए.

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