rbi-logoमुंबई . आरबीआई ने कहा कि कंपनियों को निजी नियोजन के बजाय ऋण संबंधी सार्वजनिक पेशकश लाने की जरूरत है। सरकार की ओर से बांड के जरिए जुटाए जाने वाले ऋण में बढोतरी से देश में कॉर्पोरेट ऋण बाजार की वृद्धि प्रभावित हो रही है। यह बात रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने कही।

गांधी ने यहां रेटिंग एजेंसी केयर द्वारा यहां कॉर्पोरेट ऋण पर आयोजित एक सम्मेलन में कहा, ”देश में सरकारी प्रतिभूतियों की भारी आपूर्ति से कॉर्पोरेट बांड बाजार की वृद्धि की बड़ी अड़चन है। कॉर्पोरेट ऋण बाजार की वृद्धि न हो पाने से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत करते हुए गांधी ने कहा कि हर साल सिर्फ सरकारी रिण की निर्बाध बढ़ रहा है। यदि हम सरकारी बांड बांड से तुलना करते हैं तो कॉर्पोरेट बांड बाजार बहुत छोटा है।

उन्होंने कहा कि 2013 में बकाया सरकारी बांड सकल घरेलू उत्पाद के 49.1 प्रतिशत के बराबार थी। इसकी तुलना में बकाया कॉर्पोरेट बांड जीडीपी के 5.4 प्रतिशत के बराबर ही थे। उन्होंने सरकार की राजकोषीय घाटा सीमित करने की योजना का स्वागत किया और कहा कि इससे कॉर्पोरेट ऋण बाजार का विस्तार होगा। हमने देखा है कि सरकार लगातार राजकोषीय घाटे को वास्तविक स्तर पर लाने की कोशिश रह रही है जिससे बाजार पर कम दबाव पड़ेगा। ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जबकि ऐसी अटकलें हैं कि सार्वजनिक ऋण के प्रबंधन का काम सरकार आरबीआई की जगह एक पेशेवर एजेंसी को देने जा रही है।

उन्होंने कहा कि सांविधिक नकदी अनुपात (एसएलआर) को धीरे धीरे कम करने का प्रयास भी कॉर्पोरेट ऋण बाजार के लिए भी फायदेमंद है। एसएलआर व्यवस्था के तहत बैंकों को अपने पास जमा राशियों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी बांडों में रखना पड़ता है।
गांधी ने कहा कि बैंकिंग प्रणाली में एनपीए (अवरुद्ध ऋणों) की समस्या को देखते हुए धन के लिए कॉर्पोरेट बांड बाजार की ओर मुख मोडऩा जरूरी है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि कर्जदार इकाइयां एनपीए में 90 दिन की मोहलत की अविध का अनुचित फायदा उठाती है और 89वें दिन किश्त जमा कराती है। कॉर्पोरेट बांड के मामले में इस तरह की चाल संभव नहीं होती क्योंकि इसमें तय दिन की भुगतान करना होता है। इसकी तरह कॉर्पोरेट बांड बाजार में ब्याज निर्धारण भी बहुत पारदर्शी है जो बैंक ऋण के मामले में नहीं होता।
उन्होंने कहा कि कंपनियों को निजी नियोजन के बजाय रिण संबंधी सार्वजनिक पेशकश लाने की जरूरत है। गांधी ने कहा कि पेंशन कोष, भविष्य निधि कोष और बीमा कंपनियों जैसे संस्थागत निवेशकों की भूमिका का पुनर्आकलन होना चाहिए।

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