भारत की अर्थव्यवस्था को संवारने व सम्हालने में पेट्रो क्रूड की सबसे बड़ी भूमिका है. इस क्षेत्र की जरा सी हेरफेर भारत की अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देती है और उसे स्वस्थ बनाने व रखने के लिये पेट्रोलियम क्षेत्र में उचित क्रियान्वयन की जरूरत है.

भारत के जनजीवन व आर्थिक क्षेत्र में आटोमोबाइल इंडस्ट्री निर्माण क्षेत्र में एक बहुत बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो गया है. कार, ट्रक आटो, बाइक का बाजार इस समय देश का सबसे सघन उत्पादन व उपयोग का बाजार बन गया है और हमारे इस विशाल कार उद्योग व उपयोग का मूल आधार ही पेट्रो क्रूड है और यही हमारे पास हमारी बढ़ती जरूरतों के अनुपात में सबसे कम है. हमारा पेट्रो उपयोग का क्षेत्र तो दिन दूना रात चौगुना के आधार पर बढ़ रहा है और उसी के साथ हमारी दूसरे देशों पर आश्रित होने की स्थिति भी बढ़ती जा रही है. हमारे तीन बड़े आयात है जिनमें हम अभाव की स्थिति में बने हुए हैं. खाद्यान्न तेल में हम अपनी जरूरत का 60 प्रतिशत भाग आयात कर रहे हैं और दालों के अभाव में जरूरत का 40 प्रतिशत आयात कर रहे हैं. लेकिन ये दोनों कृषि क्षेत्र की तिलहन-दलहन फसलें है जिनका उत्पादन जरूरत से ज्यादा करने के प्रयास भी युद्ध स्तर पर जारी है और वह दिन दूर नहीं है जब हम अपनी जरूरत का खाद्यान्न तेल और दालें अपने देश में ही पूरा कर लेंगे.

लेकिन भारत की पेट्रो क्रूड आइल पर निर्भरता 90 प्रतिशत है और हमारे देश में अभी वह हालात नजर नहीं आ रहे है कि हम जब इस मामले में आत्मनिर्भर हो सके. हमारा अधिकांश क्रूड खाड़ी के अरब राष्टï्रों से आता है. बहुत ही कम मात्रा में हम दक्षिणी अमेरिकी देश वेनेजुएला से प्राप्त करते है. वहां से लाने में ट्रांसपोर्ट का खर्चा बहुत आता है लेकिन हमें अपनी बढ़ती जरूरतों के कारण सभी जगहों से पेट्रो क्रूड जुटाना पड़ता है. इसके आयात में वर्ष 2014-15 में 138.3 अरब डालर खर्च करने पड़े.

घरेलू पेट्रो तेल उत्पादन में मौजूदा प्रवृत्ति को देखते हुए हमारी इसके आयात पर निर्भरता अगले दो दशकों (20 वर्ष) तक बढ़ती ही जानी है. जी.डी.पी. का अधिकांश प्रतिशत तेल आयात पर खर्च होगा और हमारी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों से बच नहीं सकती. अरब राष्टï्रों में इराक-ईरान, कुवैत, सीरिया, लीबिया, नाईजीरिया आदि में कभी भी बेतुकी अशांत स्थिति बनी ही रहती है.
ऐसे में मोदी सरकार ने दूसरों पर निर्भरता को कम करने के लिये देश में एक नई हाईड्रो कार्बन नीति की घोषणा की है. ओ.एन.जी.सी. (ऑइल एंड नेचुरल गैस कमीशन) और सरकारी क्षेत्र की कम्पनी ‘ऑइल इंडियाÓ के 69 लघु और सीमांत (स्माल एंड मार्जीनल) तेल ब्लाकों को निजी व विदेशी कम्पनियों को नीलाम करने का निर्णय ले लिया है. ये कम्पनियां इन ऑइल ब्लाकों का खनन विकसित करेंगी. उन्हें इसके सभी तेल, गैस, सी.एन.जी. नेप्था आदि सभी उत्पादों को बाजार भाव पर बेचने का अधिकार होगा, इनके आवंटन (एलोकेशन) पर कोई पाबंदी नहीं है. लागत खर्चा के बाद जो मुनाफा होगा उसमें सरकार की भागीदारी होगी. नीलामी के बाद 70,000 करोड़ रुपयों के संसाधनों का मोनीटाईजेशन होगा. इससे देश में पेट्रो क्रूड, गैस व अन्य पेट्रोलियम पदार्थों का उत्पादन बढ़ेगा और अन्य राष्टï्रों पर निर्भरता कम होगी. अपनी इतनी बढ़ी 90 प्रतिशत की जरूरत के लिये दूसरों पर निर्भर रहना बहुत ही खतरनाक स्थिति है जो हमारी अर्थव्यवस्था को ही पराधीन बनाती है.

यह बहुत ही दुखद और चिंताजनक स्थिति है कि इस समय ओ.एन.जी.सी.और ऑइल इंडिया के पास 116 ऐसे ऑइल ब्लाक हैं जिनमें धनाभाव व संरचना के अभाव में उत्पादन नहीं हो रहा है. इसमें अभी 69 ऑइल ब्लाकों को नीलाम कर उत्पादन में लाया जायेगा.

सभी पेट्रो उत्पादन के लिये एकीकृत (यूनीफाइड) लायसेंस होगा. इसमें मुनाफा में कम्पनियों व सरकार की साझेदारी बहुत नयी और सुखद नीति है.

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