बेंगलूरु. भारतीय खरीदारों के लिए ऑनलाइन बाजार में बहार का दौर लगातार बरकरार है। दीवाली पिछले महीने बीत चुकी है तो वहीं नववर्ष में अभी डेढ महीना बचा हुआ है, फिर भी ऑनलाइन बाजार एक से बढ़कर एक पेशकशों से गुलजार है। इसी कड़ी में ई-टेलिंग फर्म स्नैपडील पर सेविंग डे का बाजार सजा, जिसमें खुलते ही ताबड़तोड़ खरीदारी से जबरदस्त कारोबार हुआ। खरीदारों के जमावड़े से कंपनी की वेबसाइट एकबारगी क्रैश तक हो गई।

भले ही स्नैपडील प्रवक्ता का कहना हो कि कंपनी की वेबसाइट पर ऐसे खरीदारी मेले सजते रहते हों लेकिन सुबह 7 बजे से शुरू होने वाली इस सेल के लिए ग्राहक एकदम तैयार बैठे हुए थे। कंपनी का कहना है कि इससे पहले कम से कम पांच च्सेविंग डेज् मनाए जा चुके हैं। हालांकि त्योहारी सीजन में तमाम उत्पादों तक फैली सेल के उलट यह कुछ ही उत्पादों तक सिमटी रही। जानकारों का कहना है कि इसे लेकर ग्राहकों की प्रतिक्रिया ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा विज्ञापनों पर किए जाने वाले भारी खर्च से जुड़ी है। रिटेल सलाहकार फर्म टेक्नोपैक के चेयरमैन अरविंद सिंघल ने बताया, यह काफी हद तक संभव है कि तमाम ग्राहक ऐसे होंगे, जो टेलीविजन और अखबारों में चल रहे प्रचार अभियान के चलते साइट पर जाने के लिए प्रेरित हुए होंगे। स्नैपडील पिछले कुछ दिनों से टेलीविजन पर च्सेविंग्स डेज् को लेकर प्रचार अभियान चला रही थी। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर एक ट्वीट से इस स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है, अखबारों में जितने ज्यादा विज्ञापन होंगे, सर्वर डाउन होने की संभावना भी उतनी ही ज्यादा होगी।ज् ग्राहकों के बीच पैठ बनाने के लिए फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, एमेजॉन और मिंत्रा जैसी कंपनियां विज्ञापनों पर भारी-भरकम रकम खर्च कर रही हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि ऑनलाइन रिटेल कंपनियों का यह विज्ञापन अभियान देश के विज्ञापन उद्योग की तस्वीर बदल सकता है।

जेनिथऑप्टिमीडिया इंडिया सीईओ अनुप्रिया आचार्य के अनुसार एक साल में एक श्रेणी के तौर पर ई-कॉमर्स में चार गुने की उछाल देखने को मिली है, पिछले साल इन कंपनियों ने विज्ञापनों पर जहां 200 से 300 करोड़ रुपये खर्च किए थे, वहीं इस साल यह खर्च 1,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू रहा है। कई ग्राहकों ने भी स्नैपडील की साइट क्रैश होने को लेकर सोशल मीडिया पर अपनी शिकायत दर्ज कराई तो वहीं कई ग्राहक सिर्फ जायजा लेने के लिए उसकी साइट पर गए या फिर दूसरी कंपनियों के साथ कीमतों की तुलना कर चलते बने। बेंगलूरु में संस्थागत बिक्री से जुड़ी एक पेशेवर जोसेलिन जॉय के शब्दों से इसे समझ सकते हैं।

न्होंने बताया, मैंने टेलीविजन पर विज्ञापन देखा और चूंकि दफ्तर में काम के दौरान बहुत ज्यादा दबाव नहीं था इसलिए मैंने स्नैपडील की वेबसाइट पर ही नजर डाल ली। वहीं सिंघल का भी कहना है कि असल खरीदारों के बजाय विंडो शॉपिंग यानी महज जायजा लेने वालों की भीड़ भी साइट के क्रैश होने की एक वजह हो सकती है। उन्होंने बताया, यह वास्तविक रूप से होने वाली विंडो शॉपिंग की तरह ही है, जिसमें आपको असल में खरीदारी तो नहीं करनी पड़ती लेकिन किसी मॉल तक जरूर जाना पड़ता है।
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