देश भर के केमिस्ट आगामी 14 अक्टूबर को राष्टï्रव्यापी हड़ताल करने जा रहे जिसको निरर्थक व असफल होना ही है. उनकी मांग है कि दवाईयों में ‘ऑनलाइनÓ बाजार की अनुमति न दी जाए और इसे प्रतिबंधित किया जाए. यह ऑनलाइन बाजार का एक अति आधुनिक रूप है लेकिन यह मौलिक व नया नहीं है. जबसे भारत या संसार में पोस्टल सर्विस चली आ रही है. वी.पी.पी. ऑनलाइन बाजार था. उस समय बजाय फोन से कम्पनियों को चि_ïी से ऑर्डर भेजे जाने थे. टेलीविजन पर टेली मार्केटिंग जिसमें दवाइयां भी शामिल हैं एक लम्बे अरसे से चली आ रही हैं.

ऑनलाइन मार्केटिंग से न सिर्फ दवाईयां बल्कि भारी भरकम फर्नीचर जैसे सामान भी आने लगे हैं. कई जगह निर्माता स्वयं इनकी ऑनलाइन मार्केटिंग कर रहे हैं अन्यथा भारी पून्जी में अमेजान, फ्लिपकार्ट जैसी बड़े एजेन्ट कम्पनियों के सप्लायर बन गये हैं. आज न सिर्फ सरकार बल्कि हर संस्थान कॉम इंटरनेट से चल रहा है.

इंटरनेट से सारी दुनिया के कलेवर में सभी जगह भारी परिवर्तन आ चुके हैं. रोज नयी टेक्नोलॉजी, नया मॉडल आ रहा है. अब ऑनलाइन मार्केटिंग राज्य या राष्टï्र तक सीमित नहीं है. यह अंतरराष्टï्रीय बाजार बनने की ओर बढ़ चुका है. ऑनलाइन बाजार के सरकार नये नियम, कानून बनाने जा रही है. सरकार के हर काम आवेदन, टेंडर, रिटर्न आदि सभी कुछ ऑनलाइन हो चुका है. ऐसे में केमिस्टों की यह मांग कि दवाईयों का ऑनलाइन बाजार नहीं होने देना चाहिये- इसे प्रतिबंधित किया जाए.

यह ऐसी मांग है कि जिसे पूरा किया ही नहीं जा सकता. यह आज के तेज रफ्तार युग में बैलगाड़ी युग की बात की तरह है.

जब टी.वी. युग आया तो ऐसा प्रतीत हुआ कि सिनेमाघरों (टॉकीज) का युग उसी तरह समाप्त हो जायेगा. जैसे सिनेमा के आने से शहरों में थियेटर व ग्रामीण इलाकों में नौटंकियां खत्म हो गईं. टी.वी. युग में कुछ सिनेमा हॉल अवश्य बंद हुए लेकिन वह प्रारम्भिक असर था बाद में सिनेमा हॉलों ने सिने प्लेक्स के रूप में नया जन्म ले लिया. सभी यह महसूस करते हैं कि टी.वी. के छोटे स्क्रीन पर फिल्म देखने में वह मजा नहीं आता जो सिनेप्लेक्स में फुल स्क्रीन ‘लाइजर देन लाइफÓ इमेज देखने में आता है.

ऑनलाइन बाजारों में सभी थोक व रिटेल बाजारों पर शुरू-शुरू में थोड़ा असर जरूर पड़ रहा है. फिर भी खुद जाकर शापिंग करने का अनुभव व सुख अलग होता है. यहां कई लोग वस्तुओं, रंगों व आकार-प्रकार में अपनी च्वाइस करते हैं. रियल शापिंग के साथ-साथ बाजारों में बड़े पैमाने पर विन्डो शापिंग भी होती है जो आगे चलकर रीयल शॉपिंग भी हो जाती है. शो-रूम का अपना अलग ‘शोÓ होता है.
एक बाजार नियमित ग्राहकी और उधारी का भी होता है, जो लगभग हर परिवार का होता है. यह दुकानदार व ग्राहक का रिश्ता भी होता है. केमिस्ट समय मुख्य धारा से हट रहे हैं. इससे धारा तो धारा प्रवाह ही रहने वाली है. केमिस्ट ही इससे कट जायेंगे.

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