एक ऑनलाइन सामान बेचने वाली कम्पनी ने एक वस्तु की एम.आर.पी. (अधिकतम रिटेल प्राइस) 999 रुपये दर्शायी जबकि उसकी एम.आर.पी. 449 रुपये थी. इस पर जो भारी छूट दर्शायी गयी उसके बाद भी वह वस्तु सही एम.आर.पी. से ऑनलाइन ग्राहक को ज्यादा महंगी पड़ी. इसी तरह एक और वस्तु की एम.आर.पी. 399 रुपये की जगह 799 बतायी और इस पर भारी छूट देने का वादा किया. यह भी वास्तविक मूल्य से ज्यादा थी.

ऑनलाइन बाजार में जहां कुछ अंतरराष्टï्रीय, बहुराष्टï्रीय कम्पनियां भी विशाल पूंजी निवेश में आ रही हैं और स्थानीय स्तर पर ऐसे बाजार ”होम डिलेवरीÓÓ के नाम से आगे आ रहे हैं, केंद्र व राज्य सरकारें उपभोक्ता संरक्षण के नाम पर काफी पहले से प्रभावी कदम उठा चुकी है. जिला स्तर से लेकर राष्टï्रीय स्तर तक उपभोक्ता अदालतें हैं. जिनमें सरल प्रक्रिया उपभोक्ता वर्ग को काफी लाभ भी पहुंचा है. मोनोपोली रिस्ट्रिटिव ट्रेड प्रेक्टिस कानून में भी उपभोक्ता का हित हुआ है. अब उसे ऑनलाइन बाजार और रिडक्शन सेल में आ चुकी बेईमानी व धांधली में भी संरक्षण होना चाहिये. इन रिडक्शन सेल व ऑनलाइन में बड़ी मात्रा में चोरी का माल खपाया जा रहा है.

जैसे कबाड़ी सस्ते दामों पर कबाड़ खरीद लेते हैं उसी तरह ये सेल और ऑनलाइन वाले चोरी का माल सस्ते दामों पर ले रहे हैं. इनका दायरा बड़ा और दूर होने से इनकी जांच पड़ताल में कठिनाई है और उसे करने में काफी समय भी लगेगा. ऑनलाइन कम्पनियां डिलेवरी चार्ज के नाम पर जरूरत ज्यादा वसूल कर उसे परोक्ष मुनाफाखोरी का धंधा बनाये हुए हैं. इस बाजार के बारे में सरकारी नियामक विभाग व कानूनों का होना बहुत जरूरी हो गया है. ये लोग 75 प्रतिशत की छूट का ऐलान करते हैं. सवाल यह है कि ये निर्माता से खरीद किस भाव करते हैं इसका पता लगाया जाए. इन्हीं भारी भरकम छूट से यह अंदेशा होता है कि इस भाव में चोरी का माल ही बेचा जा सकता है. व्यापार में लागत और मुनाफा के सिद्धांत पर भी बाजार चलता है लेकिन ऑनलाइन में सब कुछ अफलातून लग रहा है या उसकेे माल की क्वालिटी बहुत ही हल्की है. ऑनलाइन में दुकान और ग्राहक ”फेस टू फेसÓÓ तो होते नहीं है पूरा ऑनलाइन व्यापार ”ब्लाइन्डÓÓ की चाल है.
इस समय जो त्योहारों का मौसम आया हुआ है उसमें यह अनुमान है कि ऑनलाइन व्यापार 52 हजार करोड़ रुपयों का हो जायेगा और इसके बिक्री क्षेत्र में 40 से 45 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की जा रही है.

रिडक्शन सेल के बारे में यह स्पष्टï है कि ये रिडक्शन होते ही नहीं हैं. माल या तो बहुत हल्का है या चोरी का होता है. सरकार को इस पर नजर व जांच पड़ताल रखनी चाहिए कि जिस भाव माल बेचा है, जो छूट व रिडक्शन दी जा रही है उसका व्यापारिक आधार क्या है. घाटा खाकर कोई धंधा होता नहीं है. ग्राहकों को इनके जरिये लूटा न जाए, उनके साथ धोखाधड़ी न हो, उनकी आड़ में चोरी का धंधा भी स्थाई धंधा न बने. इस पर सरकारी नियामक संस्था की पकड़ होनी चाहिये.

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