मोदी सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ाते हुए सिंगल ब्रांड रिटेल पर 100 प्रतिशत और राष्ट्रीय एयर लाइंस एयर इंडिया में 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी. मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही विदेशी निवेश को बढ़ावा देना प्रारंभ कर दिया.

उसे रेलवे में विदेशी निवेश की बड़ी आवश्यकता थी और उम्मीद भी थी कि उससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने मेें रेलवे के ट्रेक मेन्टेनेन्स और यात्री सुविधाओं में विस्तार किया जायेगा. लेकिन हैरानी की बात यह है कि रेलवे में विदेशी निवेश नहीं आया और आज भी रेलवे में मौजूदा व्यवस्थाओं का भी रखरखाव और पुरानी पटरियों व उपकरणों का आधुनिकीकरण नहीं हो पा रहा है. आये दिन यह खबरें आती रहती हैं कि पटरियां टूट गयीं- दुर्घटना टल गयी या हो गयी.

राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सरकारी उपक्रम एयर इंडिया भी लगातार घाटे में चल रहा है. उसे कई बार केन्द्रीय बजट से पूंजी दी गयी और यह अपेक्षा भी थी कि उससे वह घाटे से भी उबर जायेगा और सरकार द्वारा दी गयी पूंजी भी लौट आयेगी.

लेकिन कुछ समय पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने घोषणा कर दी सरकार अब और एयर इंडिया का भार नहीं ढोना चाहती और उसका विनिवेश करने का निर्णय ले लिया गया है. उसके बाद यह खबर भी आयी कि टाटा उसे खरीदना चाहता है और उसे ही दिया जा रहा है.

नेहरू युग की राष्टरीयकरण की नीति में ही उस समय की टाटा व बिड़ला की दो निजी हवाई कम्पनियों टाटा एयरलाइन्स और भारत एयरवेज का राष्टरीयकरण कर सरकारी उपक्रम एयर इंडिया अंतरराष्टरीय उड़ानों के लिये और इंडियन एयरलाइन्स देश के अंदर हवाई सेवा के लिये बनायी गयी. कुछ समय सब ठीक ठाक चला और बाद में इनकी हालत यह हो गयी कि प्रयोगों का दौर शुरू हो गया. कभी इंडियन एयरलाइंस को एयर इंडिया से जोड़ा कभी अलग स्वतंत्र कम्पनी बनाया गया.

राष्टरीयकरण के साथ ही एयर इंडिया के चेयरमेन श्री जे.आर.डी. टाटा रहे और सब ठीक चल रहा था. लेकिन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने श्री टाटा को हटाकर भूतपूर्व वायुसेना के प्रमुख एयर मार्शल श्री पी.सी. लाल के चेयरमेन बना दिया.

एयर इंडिया से टाटा का जाना ही एयर इंडिया के लिये अपशगुन हो गया और धीरे-धीरे यह हालत आ गयी कि आज उसे सरकार विनिवेश से छोडऩा चाहती है. अब इसमें विदेशी निवेश भी 49 प्रतिशत तक मान लिया गया है और हो सकता है बाकी 51 प्रतिशत भी कालांतर में देश की टाटा सहित अन्य विमान कंपनियों की उसमें भागीदारी हो जाए.

इस समय एयर इंडिया पर 52,0000 करोड़ रुपयों का कर्ज है. इसमें से 22,000 हजार करोड़ रुपये का एयर क्राफ्ट कर्ज है. बाकी उसका वर्किंग केपिटल लोन और दूसरी देनदारियां हैं.कांग्रेस नेतृत्व की प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की यू.पी.आई.

सरकार एयर इंडिया को 10 साल के लिये 30,213 करोड़ रुपयों का बेल आउट पैकेज भी दे चुकी और शर्त रखी थी कि इससे एयर इंडिया सम्हल जाये और मुनाफे में आ जाये. लेकिन यह पूंजीगत सहायता से भी एयर इंडिया उबर न सका और अब सरकार उसे छोड़ रही है.

हाल ही में एयर इंडिया के कर्मचारियों ने यह मांग की है कि एयर इंडिया का विनिवेश न किया जाए और वह सरकारी उपक्रम ही रहे. उसे सम्हलने का एक और मौका दिया जाए. उसका कर्ज माफ कर दिया और सरकार उसे और कर्ज दे लेकिन पहले इसे किया जा चुका है और उसका कोई नतीजा नहीं निकला. लेकिन फिर भी एयर इंडिया को उसी तरह यथावत् रखा जाना चाहिए जैसे सकरार रेलवे को घाटे के बाद भी छोडऩे को तैयार नहीं है. एयर इंडिया भी हवाई यातायात में कभी वास्तव में ‘महाराजा’ रहा है.

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