भारत में हर 10 साल बाद 11वें वर्ष में देश की सामान्य जनगणना अंग्रेजों के शासन काल 1901 से होती आ रही है. उस समय भारत की आबादी 23-24 करोड़ के मध्य थी जो गत जनगणना (2011) के अनुसार 120 करोड़ के लगभग है. इस बीच भारत का विभाजन 1947 में होने से कुछ बहुत लोग पाकिस्तान में भू-भाग के साथ चले गये हैं.

लेकिन भारत ने अब 84 साल के बाद देश में सामाजिक, आर्थिक जातिगणना 2011 में करायी. इसकी घोषणा पूर्ववर्ती कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने 7 मई 2010 को की थी. उस समय वर्तमान में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी और उसने सामाजिक-आर्थिक जनगणना के विचार व निर्णय का स्वागत किया लेकिन जातीय आधार पर इसकी गणना करने का विरोध किया था. अब भाजपा सत्ता में है उसने इस जनगणना के सामाजिक व आर्थिक आंकड़े तो जारी किये है लेकिन जातीय गणना जो हो चुकी है उसके आंकड़े जारी नहीं किये गये है. सरकार ने स्पष्टीकरण में कहा है कि इन्हें जारी करने का निर्णय भारत के जनगणना रजिस्ट्रार लेते है. हो सकता है कि जातीय आंकड़े बाद में जारी किये जाए.

सन् 1932 के बाद यह ऐसी पहली जनगणना है जिसमें क्षेत्र विशेष, समुदाय, जाति एवं आर्थिक समूह संबंधी विभिन्न किस्म के ब्यौरे है. इसमेें भारत के परिवारों की प्रगति का आंकलन किया गया है. यह जनगणना देश के सभी 640 जिलों में की गयी. इसमें लगभग 18 करोड़ ग्रामीण परिवारों का सर्वे किया गया. सर्वे के दायरे में देश भर के 24 करोड़ 39 लाख परिवार आये.
जहां देश में 6.68 लाख परिवार भीख मांगने का धंधा करते हैं वही 4 लाख परिवार कचरा बीनने के काम में लगे हैं. केंद्र की मोदी सरकार उसके स्वच्छ भारत अभियान में इन कचरा बीनने वालों को सम्मान का दर्जा देगी. सरकार इनके इस पेशे को मान्यता देगी. ये वर्ग भारत को काफी हद तक स्वच्छ रखने में मोदी सरकार की योजना से काफी पहले से इसमें लगा है. गरीब वर्ग के धंधों में ‘कचरा बीननेÓ का धंधा काफी प्रमुख है. इसमें बड़ा अभिशाप यह है कि इस काम में गरीब घरों के बड़ी उम्र के पालक उनके बच्चों को इस काम में लगाते हैं. बड़े उम्र के लोग बहुत कम संख्या में लगभग 5-6 प्रतिशत ही इसे करते हैं. भारत को साफ बनाने के इस काम में दशकों से जुटे ऐसे लोगों को राष्टï्रीय अवार्ड देने का फैसला लिया गया है. तीन सबसे बेहतर कचरा बीनने वाले को डेढ़ लाख रुपये का राष्टï्रीय अवार्ड दिया जायेगा. कचरा बीनने के काम में नये तरीकों को अपनाया जायेगा ताकि यह धंधा सफाई कार्य नियमित, विधिवत् और निर्धारित कार्यप्रणाली व तकनीक का धंधा बन सके. कचरा बीनने का काम जो अब तक सबसे उपेक्षित रहा, गंदगी में काम करने में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी रहा अब उसे नया रूप-स्वरूप व सम्मानजनक राष्टï्रीय मान्यता प्राप्त धंधा बनाया जा रहा है. इस कार्यक्रम में यह भी होगा कि कचरा बीनने वाले बच्चों को पढ़ाया जायेगा. एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि इन कचरा बीनने वाले बच्चों में से कोई बड़ा होकर उच्च अधिकारी, व्यापारी, उद्योगपति, विधायक व सांसद भी बने. मध्यप्रदेश में एक ऐसी मिसाल है कि राज्य के मंदसौर जिले में मनासा के भिखारी परिवार के श्री बालकवि बैरागी बचपन में अपनी छोटी उम्र की बहन के साथ हाथ में कटोरा लेकर घरों, सड़कों पर भीख मांगने का काम करते थे. बाद में वे मध्यप्रदेश में कांग्रेस के दिग्गज नेता, राज्य सरकार में मंत्री और संसद सदस्य रहे.

जनगणना के अनुसार 9.5 प्रतिशत ग्रामीण परिवार नौकरी, 51 प्रतिशत परिवार रोजनदारी की मजदूरी करते हैं, 2.37 परिवारों के पास रहने का एक कमरा है, 65 लाख परिवारों में कोई वयस्क नहीं है सभी नाबालिग हैं. गांवों में 35 प्रतिशत निरक्षर हैं, 45 प्रतिशत कच्चे मकानों में रहते हैं. गांवों में हर तीसरा परिवार भूमिहीन और 45 लाख परिवार घरों में काम करते हैं. 90 लाख घरों में महिला ही
मुखिया है.

भारत को ग्रामीण और शहरी गरीबी में अभी बहुत कुछ करना है. पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था कि ग्रामीण विकास में एक रुपये में से मात्र 15 पैसे ही विकास काम में लग पाया है- बाकी 85 पैसे भ्रष्टïाचार में चले जाते हैं.

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