अभी तक रबी फसलों, खासकर गेहूं के उत्पादक किसानों पर मौसम की जबरदस्त मार पड़ी थी. मार्च-अप्रैल की बेमौसम बरसात व ओलों ने उनकी फसलों को खेतों, खलिहान और बिक्री केंद्रों पर बरबाद कर दिया. गेहूं की किस्म इतनी ज्यादा बिगड़ गयी है कि वह खाने लायक ही नहीं है. बड़ी आटा मिलों ने आस्ट्रेलिया से गेहूं आयात कर लिया. अब केंद्र सरकार भी इस तैयारी में है कि अमेरिका व आस्ट्रेलिया से गेहूं आयात कर लिया जाए ताकि आगे चलकर कोई दिक्कत न आये अन्यथा उस समय अंतरराष्टï्रीय बाजार में गेहूं के भाव काफी ऊंचे हो जायेंगे.

लेकिन भारत की कपास उपज पर दूसरे तरह की मौसम की नहीं बल्कि भावों व निर्यात घटने की मुसीबत आ गयी है. भारत में सभी राज्यों में कपास की खेती होती है. लेकिन मध्यप्रदेश का निमाड़ क्षेत्र और महाराष्टï्र का विदर्भ क्षेत्र कपास उत्पादन के बड़े क्षेत्र है. यहां की कृषि व्यवस्था कपास की होती है. देश में किसानों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला सबसे पहले विदर्भ के कपास किसानों से ही शुरू हुआ था.

इस मामले में भारतीय स्थितियों और परिस्थितियों की विडम्बना भी बड़ी विचित्र है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राष्टï्र और दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक राष्टï्र है और हमारे कपास का सबसे बड़ा खरीददार (आयातक) चीन है. चीन में स्वयं भी कपास का विपुल उत्पादन होता है उसके बाद भी उसकी जरूरत पूरा करने के लिए वह भारत और अमेरिका से कपास का भारी आयात करता है. वह संसार में आबादी का सबसे बड़ा राष्टï्र है और उसका कपड़ा जरूरत भी उसी अनुपात में है.

भारत भी आबादी के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और हमारी कपड़ा जरूरत भी बहुत बड़ी है. इसके बावजूद भी हम अपनी कपास की खपत का घरेलू बाजार व उपयोग विकसित नहीं कर सके.

हर साल हमारा कपास व्यापार इस पर निर्भर या आश्रित रहता है कि चीन हमसे कितनी कपास खरीद रहा है. इस साल चीन से कपास की मांग में लगभग 30 प्रतिशत की कमी आ गयी है और भारत के अलावा अमेरिका में भी कपास की अच्छी फसल आई है. कपास के भारी स्टाक के कारण अंतरराष्टï्रीय कपास की कीमतों पर दबाव पड़ा है और भाव गिर रहे हैं. कपास कोई खाने की वस्तु भी नहीं है यदि समय रहते न बिकी तो किस्म गिर जाती है और कपास घाटे का धंधा हो जाता है.

कभी मुम्बई, अहमदाबाद, इंदौर-उज्जैन व कानपुर में अनेकों कपड़ा मिलों से विश्व विख्यात क्षेत्र हुआ करते थे. कालान्तर में पुरानी होती गई मशीनों को आधुनिक नहीं किया गया और सभी कपड़ा मिलें पहले बीमार और अब बंद हो गयी हैं. जहां भारत कपास उत्पादन में सबसे आगे है, उसकी घरेलू खपत को भी विकसित करना होगा.