राष्ट्रपति कोविंद ने भोपाल में 3 रचनाकारों को किया सम्मानित

भोपाल, राष्ट्रपति रामनाथ कोङ्क्षवद ने आज कहा कि संत कबीर के आदर्शों का प्रभाव भारत के संविधान में देखने को मिलता है. उनकी शिक्षा समाज के लिए संजीवनी है.

कोङ्क्षवद प्रदेश की राजधानी भोपाल के लाल परेड मैदान में सदगुरु कबीर महोत्सव को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि संत कबीर की विशेषताओं का प्रभाव डॉ भीमराव आंबेडकर के जीवन और विचारों पर देखने को मिलता है. इसी कारण संविधान में भी उसका प्रभाव दिखता है.

राष्ट्रपति ने कहा कि संत कबीर ने हमें समानता और समरसता का रास्ता दिखाया. वे संत से बड़े समाज सुधारक थे. गुरु नानकदेव भी अपने प्रवचनों में उनकी वाणी का उल्लेख करते थे.

कोङ्क्षवद ने आयोजन को कबीरपंथियों के साथ कमजोर, शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों का सम्मान बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश सरकार समावेशी विकास के लिए कार्यरत है.

यही संत कबीर का भी मुख्य संदेश था. महोत्सव को प्रदेश के राज्यपाल ओ पी कोहली, मुख्यमंत्री शिवराज ङ्क्षसह चौहान और कबीरपंथ के संत असंग देव महाराज ने भी संबोधित किया. कोङ्क्षवद की पत्नी सविता कोङ्क्षवद भी इस अवसर पर उपस्थित थीं.

राष्ट्रपति ने महोत्सव में तीन रचनाकारों रेवा प्रसाद द्विवेदी, प्रतिभा सत्पथी और के शिवा रेड्डी को कबीर सम्मान से सम्मानित किया. इसमें उन्हें तीन लाख रुपए की राशि और सम्मान पट्टिका प्रदान की गई.

अंगदान की संस्कृति पैदा करना आवश्यक

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रत्यारोपण के लिए अंगों की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए आज कहा कि देश में अंगदान की भावना और संस्कृति न होने से हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है. कोविंद ने कहा कि चिकित्सकों , शिक्षकों , शैक्षणिक संस्थानों तथा धर्म गुरूओं को अंगदान की संस्कृति पैदा करने तथा लोगों में इस भावना को बढ़ाने के लिए जागरूकता फैलानी चाहिए.

राष्ट्रपति ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि निर्धनता के कारण कुछ लोगों को अपने शरीर के अंगों को बेचने को मजबूर होना पड़ता है जो अस्वीकार्य है. उन्होंने कहा कि यदि स्वैच्छिक अंगदान की संस्कृति स्थापित होगी तो अंगों की खरीद -फरोख्त अपने आप बंद हो जाएगी.

इसके लिए लोगों को अंगदान की प्रक्रिया को सरल तरीके से समझाना तथा उनके स्वभाविक सवालों का जवाब देना होगा.राष्ट्रपति ने कहा कि अंग/देह का दान करना भारत की प्राचीन सभ्यता में लोकाचार का अभिन्न हिस्सा रहा है. इसकी भावना यह थी कि जीवित रहते या मृत्यु के बाद मानव शरीर और उसके अंग लोगों के काम आ सकें.

महर्षि दधीचि ने अपना शरीर देवताओं को दान में दे दिया था ताकि वे उनकी अस्थियों से वज्र बनाकर राक्षसों को पराजित कर सकें. उन्होंने अंगदान की भावना में कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष देश में पांच लाख लोगों की अंग प्रत्यारोपण के अभाव में मौत हो जाती है.

इनमें से दो लाख लोग लीवर संबंधी और 50 हजार हृदय धमनियों से जुड़ी बीमारियों से पीडि़त होते हैं. करीब डेढ़ लाख लोगों की किडनी प्रत्यारोपण न होने से मौत हो जाती है.

दधीचि देह-दान समिति के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह संतोष की बात है कि वह अब तक179 लोगों की देह चिकित्सा संस्थानों को दान कर चुकी है और 8 हजार लोगों ने इसका संकल्प लिया है. समिति का यह कार्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

 

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