नई दिल्ली. मौसम की मार से दलहन उत्पादन घटने की आशंका है, लेकिन दलहन कारोबारियों की भारतीय दाल बाजार को संगठित करने और उसका वायदा कारोबार शुरू करने की कोशिशों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।

दलहन एवं अनाज व्यापार के प्रमुख संगठन इंडिया पल्सेस ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) ने चने की तरह अन्य दलहनों का भी वायदा कारोबार शुरू करने की मांग दोहराई है। हालांकि उत्पादन कम होने की वजह से फिलहाल यह मुश्किल है और इससे दलहन कीमतों में बढ़ोतरी के आसार हैं।

आईपीजीए के अनुसार अंतरराष्ट्रीय दलहन सम्मेलन 2016 का तीसरा संस्करण जयपुर में फरवरी 2016 में आयोजित होगा। इस सम्मेलन में दुनियाभर के दलहन कारोबारी संगठन, किसान और व्यापारी शामिल होंगे। चेयरमैन प्रवीण डोंगरे का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2016 को अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किया है। विश्व स्तर पर सभी सहभागी देशों द्वारा दलहन के प्रति उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने, खाद्यान्न उद्योग में दालों के उपयोग में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य, पर्यावरण और कारोबार में बढ़ोतरी के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में चने की तरह दूसरी दलहन फसलों का वायदा कारोबार शुरू होना दलहन उद्योग के विकास के लिए बेहतर होगा। आईपीजीए सरकार के सामने अपनी मांग और प्रस्ताव कई बार रख चुकी है। दलहन कारोबारियों की इस मांग पर वायदा बाजार आयोग के चेयरमैन रमेश अभिषेक ने कहा कि जिंस बाजार के नियामक के तौर पर हमारी कोशिश रहती है कि बाजार के सभी भागीदारों को फायदा हो और कारोबार पारदर्शिता के साथ हो, ताकि वायदा बाजार के साथ-साथ हाजिर बाजार का भी विकास हो सके। हम जिंसों में ऑनलाइन व्यापार को बढ़ावा देने के साथ वायदा बाजार को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। लोगों में और जागरूकता लाने की जरूरत है। जहां तक दलहन के वायदा बाजार की बात है, हमें इस क्षेत्र में अहम सुधार होने की उम्मीद है। फिलहाल एफएमसी जिन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, उसमें से एक वायदा बाजार में उपलब्ध भंडारण की गुणवत्ता है। विनिमय क्षेत्र में सभी भंडारों का पंजीकरण भंडार नियामक के पास होना चाहिए। 2013 में सभी एक्सचेंजों में सेटलमेंट गारंटी फंड की स्थापना की गई है, ताकि जिंस बाजार के सभी हितधारकों को वायदा कारोबार में शामिल होने का आत्मविश्वास पैदा किया जा सके।

आईपीजीए के उपाध्यक्ष विमल कोठारी का कहना है कि इस साल कम उत्पादन के चलते आयात पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे दालों की कीमतें बढ़ेंगी। इस सीजन में आयात पर निर्भरता बढ़ेगी। सरकार का कोई भी नया कदम उठाना मुश्किल है, क्योंकि कृषि जिंसों का कारोबार और इनकी कीमतें बहुत ही संवेदनशील होती हैं, जिसकी वजह से सरकार के ऊपर दबाव रहता है। इस साल रबी सीजन में चने का उत्पादन करीब 15 फीसदी कम रहने की आशंका है।

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