कांग्रेस संगठन में इन दिनों पार्टी संगठन में फेरबदल का दौर शुरू हो गया है. पुराने लोगों के नेतृत्व के स्थान पर नये युवा वर्ग को आगे लाया जा रहा है. पूरी तैयारी इस बात पर हो रही है. अगले माह अप्रैल मेें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में पार्टी उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी की जगह पार्टी का अध्यक्ष पद सम्हालेंगे. कुछ समय पूर्व श्रीमती गांधी किसी बड़ी बीमारी से ग्रस्त होकर इलाज के लिये अमेरिका गयी थी. उसके बाद श्री राहुल गांधी को जब पार्टी में कभी-कभी रहने वाला उपाध्यक्ष पद दिया गया तो यही अनुमान लगाया गया कि श्रीमती गांधी अध्यक्ष पद का दायित्व श्री राहुल गांधी को सौंपने जा रही है.

कांग्रेस जैसे बड़े संगठन के लिये चुनावों की हार-जीत को मसला समीक्षा मात्र का होता है जो हर पार्टी में होता है. आजादी के पहले और बाद में भी कांग्रेस ने चुनावों में काफी उलट-फेर का सामना किया है. लेकिन वे उसके अस्तित्व का प्रश्न कभी नहीं बने. भारत की राजनीति में कांग्रेस की बेजोड़ भूमिका है. आजादी में पहले स्वाधीनता संग्राम के दौरान भी 1919 और 1935 में अंग्रेज शासन काल में बहुत हद तक सीमित दायरे व अधिकारों में चुनाव होते रहे हैं. कांग्रेस ने इस दौर में एक तरफ मुस्लिम सांप्रदायिकता की पार्टी मुस्लिम लीग और दूसरी ओर हिन्दू सांप्रदायिकता की हिन्दू महासभा के बीच सबसे शक्तिशाली व प्रभावी राजनैतिक पार्टी की भूमिका अदा की धी.

आजादी के बाद एक लंबे समय तक देश में केंद्र से लेकर राज्यों तक सत्ता में चुनावों में भारी जनादेश कांग्रेस को ही मिलता रहा और वही देश की एकमात्र लोकप्रिय पार्टी के रूप में सत्ता में रहीं. 1956 में भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन में राज्यों भाषायी और क्षेत्रीयता की राजनीति आयी और चुनावों में लोगों के राजनैतिक सोच का दायरा राष्टï्रीय से क्षेत्रीय और उससे भी नीचे जाकर जातीय आधार का बनता गया. इससे देश में क्षेत्रीय व भाषायी राजनीति के कारण राष्टï्रीय स्वरूप व चरित्र की कांग्रेस पार्टी को काफी नुकसान हुआ और उसका आधार कई जगहों पर घटा और राज्यों में और बाद में केन्द्र में भी उसके हाथों सत्ता जाने और वापस आने का दौर शुरू हो गया है जो चलता जा रहा है. ऐसे दौर भी आते रहे कि कभी कांग्रेस का जनाधार चुनावों में काफी गिरा तो कभी फिर से पुन: बढ़कर आया. एक समय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी बाहरी समर्थन से सरकार चलाई. इसी तरह बाहरी समर्थन से नरसिम्हाराव की सरकार भी चली.

आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस की सबसे जबरदस्त हार केन्द्र व राज्यों में हुई. लेकिन यह करिश्मा भी हुआ कि तीन साल बाद 1980 में वह भारी बहुमत से सत्ता में आयी. उसके बाद की यूपीए की राजनीति में वह उनके नेतृत्व में साझा सरकारों के दौर में आई. इसी समय दूसरी बड़ी भारतीय जनता पार्टी ने भी उसके नेतृत्व में एनडीए की साझा सरकारों का दौर चलाया.

सन् 2013-14 के लोकसभा के चुनाव में यह बड़ा परिवर्तन हुआ कि कांग्रेस के बाद पहली बार कोई पार्टी भारतीय जनता पार्टी खुद के बहुमत से केंद्र में सत्ता आयी है और कई राज्यों में भी यह स्थिति बनी है. इस परिवर्तन को देखते अब कांग्रेस ने भी साझा राजनीति का मोह छोड़कर अपनी पार्टी को पुन: सशक्त करने का फैसला किया है और इसका दायित्व श्री राहुल गांधी को सौंपा जा रहा है. अब कांग्रेस में राहुल नेतृत्व और दौर प्रारंभ हो रहा है.

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