यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश अभी भी पूर्ण सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य को प्राप्त नही कर पाया है. भारत दुनिया के उन 10 देशों में शुमार है, जहाँ दुनिया की 58 फीसदी मातृ मृत्यु होती हैं. 2014 में आई संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013 में दुनिया में 2.89 लाख महिलाओं की मृत्यु प्रसव और शिशु जन्म के समय आयी जटिलताओं के कारण हुई है,

कहते हैें कि जब महिला बच्चे को जन्म देती है तो वह इतनी पीड़ा से गुजरती है कि एक तरह से उसका पुन: जन्म होता है, लेकिन क्या देश में इन माताओं की स्थिति अच्छी है? क्या उन्हें सुरक्षित मातृत्व मिल रहा है? क्या उनको स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पा रही है? क्या सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का वो लाभ उठा पा रही हैं? इन सब बातों को जानने-समझने की कोशिश करते हैं, बात आगे बढ़े उससे पहले हमें सुरक्षित मातृत्व के बारे में जानना होगा, किसी भी महिला की मृत्यु प्रसव के दौरान या अगर गर्भपात हुआ है तो उसके 42 दिनों बाद तक उस महिला की मृत्यु न हुई हो, यह सुरक्षित मातृत्व है.

लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश अभी भी पूर्ण सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया है. भारत दुनिया के उन 10 देशों में शुमार है, जहाँ दुनिया की 58 फीसदी मातृ मृत्यु होती हैं. 2014 में आई संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013 में दुनिया में 2.89 लाख महिलाओं की मृत्यु प्रसव और शिशु जन्म के समय आयी जटिलताओं के कारण हुई है, इन कुल मौतों का 17 प्रतिशत याने 50 हजार मातृ मृत्यु अकेले भारत में हुई हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या विभाग की इंटर एजेंसी ग्रुप रिपोर्ट 2013 के अनुसार भारत को मातृ मृत्यु दर के ट्रेंड के आधार पर एक सौ अस्सी देशों में एक सौ छब्बीसवें स्थान पर रखा है. रिपोर्ट में भारत में महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) को लेकर भी चिंता है.

इसी प्रकार सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य की स्थिति रिपोर्ट 2014 के अनुसार भारत सरकार ने मातृ मृत्यु दर का लक्ष्य 2015 तक 109 तक लाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अनुमान है कि यह केवल 140 तक ही पहुंच पायेगी. वही देश में 2015 तक प्रशिक्षित स्वास्थकर्मी के द्वारा डिलेवरी कराने का लक्ष्य शत-प्रतिशत रखा गया था लेकिन जिस तरह से देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति है उसे देख कर अनुमान है कि केवल 62 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं की डिलेवरी प्रशिक्षित स्वास्थकर्मी द्वारा हो सकेगी.

प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के रुडो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि भारतीय महिलाएं जब गर्भवती होती हैं तो उनमें से 40 फीसदी से अधिक गर्भवती महिलाऐं सामान्य से कम वजन की होती हैं भारत में गर्भधारण के दौरान औसत महिलाओं का वजन केवल सात किलोग्राम बढ़ता है जबकि सामान्यतया गर्भवती महिला का वजन इस दौरान 9 से 11 किलोग्राम तक बढऩा चाहिए. गर्भावस्था के दौरान वजन कम बढऩा ना केवल गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए खतरे का सूचक है बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा है.

मातृ मृत्यु का प्रमुख कारण देश में महिलाओं का प्रसव पूर्व, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और उस तक पहुंच का ना हो पाना है. यह मातृ मृत्यु की स्थिति को भयावह बना देती है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गाव में निवास करती है. लेकिन विडम्बना यह है कि देश में उपलब्ध कुल चिकित्सा सेवाओं का केवल 30 प्रतिशत ही ग्रामीण क्षेत्र में उपलब्ध है. देश में स्त्री रोग विशेषज्ञों और चिकित्सकों के 40 प्रतिशत पद खाली हंै ंऔर वो भी ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र. अगर 2011 के ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों को देखें तो पाते हैं कि गावों में 88 फीसदी विशेषज्ञ डॉक्टरों तथा 53 फीसदी नर्सो की कमी है. शहरों में 6 डाक्टर प्रति दस हजार जनसंख्या में हैं वही ग्रामीण में यह 3 डाक्टर प्रति दस हजार जनसंख्या में हो जाती है.

बाल विवाह भी मातृ मृत्यु का एक कारण है. यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट एंडिंग चाइल्ड मैरिज प्रोग्रेस एंड प्रोस्पेक्ट 2014 के अनुसार दुनिया की हर तीसरी बालिका वधू भारत में है. याने दुनिया भर में एक तिहाई बालिका वधू भारत में रहती हैं. कम उम्र में गर्भवती होने से जान के खतरे का प्रतिशत और बढ़ जाता है. सरकार द्वारा मातृत्व स्वास्थ्य को लेकर कई कानून और योजनाऐं बनायी गई हैं.
देश में मातृ मृत्यु दर में जितनी गिरावट आनी चाहिए थी वह नही आ रही है. हम सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य से कोसों दूर हैं. यह कितना दुर्भागयपूर्ण है कि आजादी के इतने सालों बाद भी महिलाओं को ऐसी सुविधा नहीं मिल पा रही है जहां वह सुरक्षित डिलेवरी करवा सकें.

उन्हें पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा मिल सके, कहने को हम 21 वीं सदी में हे लेकिन आज भी महिलाओं को इंसान के बतौर नही देखा जाता है. उनकी स्थिति दोयम दर्ज की ही है. उनके साथ जाति, धर्म, लिंग, रंग के आधार पर भेदभाव और हिंसा अभी भी जारी है. अगर देश की आधी आबादी को स्वास्थ्य का हक़ ना मिल पाए तो ना केवल उनका बल्कि देश भी विकास की ओर अग्रसर नहीं हो सकता. इसलिए यह बहुत जरुरी हे कि समाज और सरकार मातृत्व हक की जरूरत और जिम्मेदारी को महसूस करें और इसे प्रमुखता से समझे. इसके लिए समाज और सरकार को मिल कर सघन रूप से काम करने की जरुरत हे. सुरक्षित मातृत्व हक को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण एवं माहौल बनाया जाये. महिलाओं को केवल बच्चा पैदा करने वाला माध्यम ना समझा जाये और सभी महिलाओं को न केवल शतप्रतिशत सुरक्षित मातृत्व स्वास्थ्य मिल सके साथ ही साथ स्वास्थ्य सुविधाओ तक उसकी पहुच हो और महिला को अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार हो.

उपासना बेहार