काला धन पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी राजनैतिक विदूषक ही साबित हो रहे हैं. वे जितना ऊंचा बोल चुके हैं अब उतना ही नीचा देख रहे हैं. लोकसभा चुनाव प्रचार में बड़ी ही दमदार आवाज में दावेदारी कर दी कि उन्हें व उनकी भारतीय जनता पार्टी को यह पता है कि भारतीयों का कहां कितना काला धन विदेशी बैंकों में छिपा पड़ा है और यदि वे सत्ता में आये तो उसे निकाल लायेंगे. हिसाब इस ढंग से बताया कि वह इतना है कि हर भारतवासी के बैंक खाते में 15 लाख रुपये आ सकते हैं.

भारत की आबादी 125 करोड़ है इसी से काला धन का अंदाजा लगाया जा सकता है. इससे पूर्व 2009 के लोकसभा चुनाव में ही भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री पद के पार्टी प्रत्याशी श्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी काला धन के मुद्दे को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया था. श्री आडवाणी चुनाव में असफल रहे थे.
इस बार सरकार जीतने के कारण लोगों ने उनसे काला धन लाने को कहा तो तबसे लेकर अब तक बगले झांक रहे हैं. बड़बोलेपन में बहुत कुछ बोल तो गये पर अब कुछ भी कर नहीं पा रहे हैं. ऐसा आभास दे रहे हैं कि ‘ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया.’

मोदी सरकार के केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली भी यह लफ्फाजी करते नजर आ रहे हैं कि विदेश की सरकारों से बात कर रहे हैं. जब वहां से कोई बात नहीं बनी तो देश में तीन महीनों (90 दिन) का समय 1 जुलाई से 30 सितम्बर तक टाइम काला धन वालों को दिया कि वे अपनी काली कमाई घोषित कर दें अन्यथा उसके बाद उन पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही और जेल की सजा भी हो जायेगी.

इस भपकी या धमकी से भी काम नहीं बना, तीन महीनों में मात्र 638 लोगों ने 3770 करोड़ ही घोषित किये हैं. इसे घोषित करने वाले उनकी रकम पर 30 प्रतिशत टैक्स और 30 प्रतिशत पेनाल्टी देना होगा जिससे सरकारी खजाने में 2262 करोड़ आयेंगे. जबकि लोकसभा चुनावों के समय श्री मोदी ने यह कहा था कि विदेशों में भारत का 80 लाख करोड़ का काला धन है और हमारी सरकार बनी तो 100 दिन के अन्दर वापस ले आयेगी और हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख जमा करायेगी. जबकि मोदी सरकार को सत्ता में आये 16 महीने हो चुके हैं और मात्र स्वेच्छा से 3770 करोड़ रुपये ही प्राप्त होने की घोषणा हो जाती है इससे लोगों की तसल्ली तो हो नहीं सकती इसलिए मोदी सरकार द्वारा खुद की तसल्ली के लिये यह कहा जा रहा है कि जिन्होंने काला धन घोषित नहीं किया उन्हें अब 120 प्रतिशत जुर्माना और 10 साल की सजा होगी.

साथ ही सरकार ऐसी कानूनी व्यवस्था बना रही है जिससे विदेशी बैंकों में भारतीयों का काला धन जब्त कर अपने खाते में ले लेगी. सरकार का यह इरादा भी महज लफ्फाजी लगता है. यहां का कोई भी कानून विदेशों में सरकारों व वहां के बैंकों पर लागू नहीं हो सकता है. सरकार को यह भी नहीं पता कि वहां किसका और कितना रुपया जमा है. तब सवाल यह है कि इस तरह की बेतुकी लफ्फाजी से सरकार चलाना तुगलकी घोषणा ही लगती है.

बोफोर्स तोप सौदे में भी ऐसा ही हुआ था. प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी पर गंभीर आरोप लगे. लोकसभा चुनाव जनता मोर्चा के श्री वी.पी. सिंह और भाजपा-एन.डी.ए. के श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता में आते ही 100 दिनों में बोफोर्स भ्रष्टाचार उजागर कर देने का वायदा किया. दोनों सत्ता में आये और प्रधानमंत्री भी बने. श्री वी.पी. सिंह 11 महीने रहे और श्री वाजपेयी 5 साल प्रधानमंत्री रहे, लेकिन बोफोर्स में कुछ भी भ्रष्टïाचार साबित नहीं कर सके.

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