जम्मू-काश्मीर में पी.डी.पी. और भाजपा की साझा सरकार को 10 महीने ही हुए थे कि पी.डी.पी. नेता और मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु हो गयी. सामान्य रूप से उसके बाद यह निश्चित ही लग रहा था कि उसकी लोकसभा की संसद सदस्य बेटी महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बन रही हैं. भारतीय जनता पार्टी ने भी यह कह दिया था कि वे उनका समर्थन करेगी. लेकिन महबूबा मुफ्ती ने इस मामले पर बिल्कुल चुप्पी साध ली है और वे सरकार बनाने को आगे भी नहीं आ रही है. ऐसी स्थिति में राज्यपाल का शासन लगा दिया है जिसे संवैधानिक विवेचना में राष्टï्रपति शासन ही माना जायेगा.

गत 2 फरवरी को जम्मू-काश्मीर के राज्यपाल श्री एन.एन. वोहरा ने दोनों साझा पार्टियों के नेताओं को बुलाकर उनसे जानना चाहा कि क्या वे सरकार बना रहे हैं, इसके प्रतिउत्तर में भारतीय जनता पार्टी ने 10 दिन का समय उनका निर्णय बताने को चाहा है और 12 फरवरी तक उन्हें अपना निर्णय बताना होगा. लेकिन पी.डी.पी. की नेता महबूबा मुफ्ती ने कुछ नहीं कहा है.

लेकिन राजनैतिक तौर पर यह कहा कि सरकार बनाने के लिये माहौल की जरूरत है. केन्द्र सरकार को इसके लिये कुछ कदमों की घोषणा करनी चाहिए. महबूबा चाहती हैं कि काश्मीर के मसले पर केन्द्र सरकार घाटी के अलगाववादी हुरियत-जमाते इस्लामी से बात करे और स्पेशल आम्र्ड फोर्सेस एक्ट वापस ले. महबूबा की भूमिका हमेशा से फिरका परस्ती (साम्प्रदायिकता) की रही है और वे अलगाववादी के समर्थन में है.

भारत सरकार का हमेशा से यह रवैया है कि काश्मीर मसले पर भारत-पाकिस्तान के अलावा कोई तीसरा पक्ष नहीं होगा और पाकिस्तान पहले यह चाहता था कि इसमें संयुक्त राष्टï्र या कोई अन्य राष्टï्र तीसरा पक्ष बने. सबके इंकार करने के बाद अब वह चाहता है कि इसमें काश्मीर के अलगाववादियों को ही तीसरा पक्ष बनाया जाए. जब भी भारत-पाक वार्ता तय होती है-

भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अलगाववादियों को आमंत्रित कर उनसे वार्ता करने लगते है और इस हरकत पर भारत वार्ता को रद्द कर देता है. अब महबूबा का कदम भी यही है कि अलगाववादियो ंको तीसरा पक्ष बनाया जाए और वेे पाकिस्तान के कदम का समर्थन ही कर रही है. उनकी दूसरी मांग यह है कि वहां से भारतीय फौजों की भूमिका स्पेशल पावर्स ऐक्ट… वापस लेकर खत्म की जाये. इसका नतीजा यह होगा कि वहां अलगाववादी व पाकिस्तान से आने वाले आंतकियों को खुला मैदान मिल जायेगा.

मोदी सरकार का यह निर्णय है कि घाटी से हिन्दू होने के नाते जिस आबादी को मुसलमान फिरकापरस्त अलगाववादियों ने बाहर खदेड़ दिया है. उन्हें फिर से वहां बसाया जाए. महबूबा भी उन लोगों में से है जो इसका इस तरह विरोध कर रहे है कि उनकी अलग बस्ती न बसायी जाए बल्कि उनके छोड़े गये घरों में वापस भेजा जाए. जबकि सरकार सुरक्षा की दृष्टिï से यह चाहती है कि वे एक जगह इक_ïे बसाये जाए ताकि कभी सांप्रदायिक स्थिति बिगडऩे पर उन्हें खतरा न रहे.

जिस तरह अन्य राज्यों में मुसलमानों की हज यात्रा के लिये हज हाऊस बनाने के लिये सरकारें जमीन दे चुकी हैं, उसी तरह काश्मीर में अमरनाथ यात्रा के लिये यात्रा भवन बनाने के लिये नेशनल कान्फ्रेस की उमर अब्दुल्ला ने जमीन दी थी जिसका महबूबा मुफ्ती ने उसकी साम्प्रदायिकता में विरोध किया था. धार्मिक बिखराव में घाटी के मुसलमान और जम्मू के हिन्दुओं में काफी तनाव हो गया था. उसका परिणाम भी यही रहा कि आगामी विधानसभा में घाटी में मुसलमानों के कारण पी.डी.पी. को 28 सीटें मिलीं और हिन्दुओं के कारण जम्मू में भारतीय जनता पार्टी को 25 सीटें मिलीं.

इस तरह वह महबूबा के कारण यह धार्मिक रूप से राजनीति का बटवारा हो गया और इसी की परिणिति बाद में दोनों पार्टियों की साझा सरकार में हुई. अब महबूबा फिर से अलगाववादियों के पक्ष में राजनैतिक दांवपेंच कर रही है. इससे ऐसा लगता है कि आगे इनकी साझा सरकार संïभवत: न बन पाए.

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