कश्मीर में अलगाववादियों ने अब अपनी चालों में काफी बदलाव किया है, लेकिन केंद्र सरकार भी अब उनके प्रति उतनी सख्त हो
गयी है.

एक अर्सा पहले भारत विरोधियों ने यह हासिल कर लिया था कि यू.पी.ए. के शासन काल में वहां से फौज हटा ली गयी थी और उसके स्थान पर सी.आर.पी. एवं बी.एस.एफ. जैसे अद्र्ध सैनिक बलों को वहां तैनात किया. वहां जो भी अपराध होते भारत विरोधी तत्व उसे सैनिक बलों के जवानों द्वारा किया जाना बताते और उस पर भावनाएं भड़का कर प्रदर्शन करते.

एक बार यह प्रगट हो गया कि दो लड़कियों की लाश मिलने पर जवानों पर रेप व हत्या के आरोप लगाये गये. जनभावना को भड़काया और अन्त में यह सिद्ध हुआ कि उनकी हत्या उनके परिवार वालों ने ‘आनर किलिंगÓ के रूप में की और रेप होने का कोई प्रश्न ही नहीं था.

अब इन तत्वों की यह नयी चाल है कि सीधा फौजों से भिड़ा जाए और पत्थरबाजी उसका हथियार हो. अब लड़कियों से भी पत्थर फिकवाने लगे है. इन लोगों को पत्थर फेंकने के लिये मजदूरी दी जाती है. जिसके फंड व हथियार पाकिस्तान व चीन से आये है. अब यह कदम उठाया जा रहा है कि जहां भी एक-दो जवान दिखे उन पर हमला कर उनके हथियार छीने जाए. जब फौज पाकिस्तान से घुसपैठ करने वाले आतंकी का एनकाउन्टर करे तो उन्हें बचाने के लिये फौज पर भीड़ पत्थरबाजी करे. अब यह बात जोड़ दी गयी है कि एनकाउन्टर में जो भी आतंकी मारे जाए उनकी लाश मांग कर उनका जुलूस निकाला जाए?

अब इनके निशाने पर वहां घाटी क्षेत्र में काम कर रहे राजनैतिक दल व उनके सदस्य आ गये हैं. इन्होंने अनंतनाग में पी.डी.पी. के नेता की हत्या कर दी. कई सरपंचों को इसलिए मार दिया कि उन्होंने चुनाव क्यों लड़ा. अब राजनैतिक दलों से व उनके सदस्यों को चेतावनी दी गई है कि वे राजनीति करना बन्द करें. अब वहां जो भी होगा वह केवल आतंकवादी ही करेंगे. यह नीति श्रीलंका में लिट्टे ने अपनायी थी.

वहां तमिल राजनीति के कई संगठन थे. वे चुनाव भी लड़ते थे और सांसद भी होते थे. लिट्टे ने इन तमिल नेताओं को मारना शुरू किया. कई तमिल सांसद को मार दिया. कुछ लोग भागकर चैन्नई में आकर रहने लगे. यहां भी उनके स्थानों पर हमला करके सामूहिक हत्याएं कर दीं. इस तरह श्रीलंका में तमिल के नाम पर केवल एक ही संगठन लिट्टे बचा और इसका तरीका तमिलों पर सबसे पहले आतंक फैलाकर अपने साथ करना था. लेकिन श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री महेन्दा राजपक्षे ने इसका सैनिक समाधान ही एकमात्र विकल्प मानकर लिट्टे पर हमला करके उसे एक हल्ले में जड़ से मिटा दिया.

काश्मीर में भी यही नीति अपनायी जा रही है. जहां का बार ऐसोसिएशन भी इनकी मदद को सुप्रीम कोर्ट में आया और प्रार्थना में कहा कि अदालत वहां पत्थरबाजों के खिलाफ पैलेटगन बन्द करवा दे, लेकिन पत्थरबाजी पर कुछ नहीं कहा. इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फटकार लगायी कि पहले यहां पत्थरबाजी बन्द कराओ तब पैलेटगन को रोकने के बारे में विचार होगा. हो सकता है उस हालत में उसकी जरूरत ही न पड़े.

बार एसोसिएशन ने यह चाल भी चली कि अदालत सरकार को यह निर्देश दे कि वह उन तत्वों से संविधान के दायरे के बाहर जाकर भी वार्ता करे, जो कोई भी सरकार नहीं कर सकती. बार का उद्देश्य यह था कि ये तत्व जिस ‘आजादीÓ की बात कर रहे हैं उस पर बात
हो जाए.

मोदी सरकार ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि न तो संविधान के दायरे के बाहर बात होगी और न पैलेटगन रोकी जाएगी. बात भी वहां केवल राजनैतिक दलों
से होगी.

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि भारत सरकार जल्दी वार्ता शुरू करे, अन्यथा वे इस्तीफा देकर साझा सरकार से हट भी सकती हैं. यह संभावना है कि वहां ऐसा इस्तीफा हो जाए और गवर्नर शासन लग जाए. उस स्थिति में सरकार कोई अंतिम फैसला या कदम उठा सकती है.

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