काश्मीर में हर वक्त हर किसी बात को मुद्दा बनाकर अलगाववादी तनाव बनाये ही रखते है. अभी लंबी प्रतीक्षा के बाद वहां महबूबा मुफ्ती फिर से सरकार बनाने को राजी हुई. मुख्यमंत्री भी बनी और अनन्तनाग से विधानसभा का चुनाव लड़ रही है. यह सीट उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद जो मुख्यमंत्री थे, उनके निधन से खाली हुई है.

महबूबा इस समय लोकसभा की सदस्य है. वे विधानसभा के लिये चुने जाने के बादं लोकसभा की सीट में इस्तीफा देगी और कुछ महीनों बाद वहां भी उपचुनाव होगा. इस समय अलगाववादी दिन दहाड़े एकाएक बीएसएफ के जवानों पर दो बार हमले कर चुके है. जिनमें 5 जवान मारे गये.

अलगाववादियों का इरादा महबूबा मुफ्ती का चुनाव बिगाडऩा है. शायद वे पोलिंग के दिन या किसी सभा व रैली में हमला कर सकते है. कभी महबूबा मुफ्ती ने श्री नगर में अमरनाथ यात्री निवास के लिये जमीन देने का विरोध कर काश्मीर घाटी और जम्मू अंचल में भारी तनाव की स्थिति बना दी थी. इन दिनों अलगाववादी इस बात का विरोध कर रहे है. वहां भूतपूर्व सैनिकों की कालोनी न
बनायी जाए.

केंद्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह यह कह चुके है कि वहां से विस्थापित किये जा चुके काश्मीर पंडितों को पुन: वहां पृथक बस्ती बनाकर बसाया जायेगा. इसका यह कहकर विरोध किया गया कि उन्हें उन्हीं जगहों पर बसाया जाए जहां वे पहले रहते आये है. अब महबूबा मुफ्ती यह कह रही है कि इस वक्त वहां काश्मीरी पंडितों को उन्हीं जगहों पर पुन: बसाने लायक वातावरण नहीं है.

काश्मीर में यह अजीब सी स्थिति हमेशा बनी रहती है. काश्मीर में भारतीय जनता पार्टी का चुनाव में और इससे भी पूर्व लोकसभा के चुनावों में इस पार्टी का यह चुनावी वादा है कि काश्मीरी पंडितों को पुन: काश्मीर घाटी में बसाया जायेगा. इस समय महबूबा मुफ्ती का कहना है कि उन्हें वापस बसाने का वातावरण नहीं है- आगे चलकर पी.डी.पी. व भाजपा सरकार के साझा सरकार में संकट पैदा कर सकता है. इस समय बीएसएफ पर जो हमले बढ़े हैं वह भी मेहबूबा के विरुद्ध ज्यादा लग रहे हैं ताकि उनकी साझा सरकार में संकट की स्थिति
बन जाए.

इस समय मोदी सरकार और राज्य की साझा सरकार को इस बात में नहीं पडऩा चाहिए कि वहां वातावरण सुधरेगा तभी कार्यक्रमों को लागू किया जायेगा. यदि यह रवैया अपनाया गया तो फिर वहां कभी कुछ नहीं किया जा सकेगा.
काश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच बात हो- इस बात में अब कोई औचित्य नजर नहीं आता. अभी तक बातचीत किसी न किसी स्तर पर होती ही रही और यह सिलसिला चलते रहने में कभी कुछ नतीजा निकलेगा- ऐसा भी नहीं लगता. मामला आज भी वैसा ही बना हुआ है.

फर्क इतना भर आया है कि कभी यह मामला संयुक्त राष्ट्र के समक्ष था. उसने यह तय किया कि पाकिस्तान वहां से अपनी सेनाएं हटाये और उसके बाद भारत वहां जनमत संग्रह कराये. पाकिस्तान ने फौजें नहीं हटाईं इसलिए आगे की कार्यवाही जनमत संग्रह की नौबत ही
नहीं आयी.

श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री जुल्फिकार अली भुट्टïो के बीच शिमला समझौते के तहत यह तय हुआ कि मामला संयुक्त राष्ट्र से उठा लिया जाए और यह मामला दोनों देशों के बीच का ही रहेगा. अब काश्मीर के अलगाववादी यह कहते हैं कि वे तीसरा पक्ष हैं और भारत-पाक वार्ता के संदर्भ में पाकिस्तान उनसे वार्ता करने लगता है और वार्ता रद्द हो
जाती है.

अब क्या होगा-कैसे होगा, कब होगा को सोचना छोड़कर काश्मीर की साझा सरकार अपना कार्यक्रम तेजी से लागू करती जाए और यह मान ले, जो भी होना हो- वह हो जाए.

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