दिल्ली में श्री अरविन्द केजरीवाल की ‘आप’ पार्टी अब तक के सबसे बड़े बहुमत 70 में से 67 सीटें पाकर दिल्ली राज्य में सत्तारूढ़ हो गयी है. चुनाव नतीजे आते ही उन्होंने अपने विजय भाषण में यह यथार्थ भी कह दिया कि उन्हें इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी. आप के एक अन्य प्रमुख नेता श्री कुमार विश्वास ने भी यह कहा कि हमारा अनुमान 40 से 45 सीटें पाने का था. श्री केजरीवाल ने यह भी कहा कि इतनी बड़ी जीत से डर लग रहा है और श्री कुमार विश्वास की धारणा है कि इतनी बड़ी अप्रत्याशित जीत से लोगों की हमारी सरकार से अत्याधिक व अप्रत्याशित अपेक्षायें भी होंगी और हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.

कई लोगों को दिल्ली के नतीजों से राजनैतिक रूप से निराशा या अति उत्साह की भावना है, लेकिन चुनावी विज्ञान इसका विश्लेषण काफी कुछ स्पष्ट है. दिल्ली में बिना किसी पार्टी या नेता के प्रयासों के चुनावी माहौल में दो पार्टियों के बीच (बाई पोलर) ध्रुवीकरण हो गया है, उसकी वजह से ऐसे परिणाम कई जगहों के चुनाव में आते रहे हैं.

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा में ‘आपÓ को 2013 के चुनावों में 28 सीटें और 29.49 प्रतिशत वोट मिले थे जो अब 2015 में बढ़कर 67 सीटें (+ 39) और वोट प्रतिशत 54 प्रतिशत हो गया. भारतीय जनता पार्टी को 31 के स्थान पर केवल 3 सीटें मिली और उसका वोट प्रतिशत लगभग यथावत् 2013 के 33.07 के स्थान पर 32.40 मात्र 0.67 प्रतिशत की कमी आयी. कांग्रेस 8 सीटों से जीरो (0) हो गई और उसका वोट प्रतिशत 24.55 से भारी गिरावट से घटकर मात्र 09.40 प्रतिशत हो गया, जबकि ‘आपÓ के वोट में 24.51 प्रतिशत का इजाफा हुआ. भाजपा का वोट प्रतिशत नहीं घटा केवल सीटें घट गयी. और इसका एक मत कारण ‘बाई पोलरÓ (दो पार्टी के बीच) ध्रुवीकरण हो जाना है.

मध्यप्रदेश में ऐसा हो चुका है कि 2003 से दिग्विजय सिंह दो टर्म की 10 साल की सरकार हार कर 37 सीटों पर सिमट गयी और भारतीय जनता पार्टी जो एक तिहाई से विजय की उम्मीदवार रही थी वह दो तिहाई के भारी बहुमत से जीत गयी. उस समय भारतीय जनता पार्टी ने भी केजरीवाल की तरह यह आश्चर्य से स्वीकार किया था कि उन्हें इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी. लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश की 80 सीटों में से 73 सीटें भी भाजपा ने ‘बाई पोलरÓ ध्रुवीकरण से जीती थी.

जहां दो पार्टी सिस्टम बन जाता है वहां या तो ‘नेक-एन-नेकÓ बहुत कम अंतर से जीत-हार होती है या भारी भरकम (लेन्ड स्लाइड) जीत-हार होती है. दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे स्वस्थ प्रजातंत्र के विकास की ओर इंगित कर रही है.

दिल्ली में स्वत: ही यह स्थिति बन गयी थी कि ‘कांग्रेस कहीं कुछ नहीं हैÓ और लोगों ने ‘आपÓ और भाजपा के बीच ही मतदान किया. भारतीय जनता पार्टी का वोटर समर्थक लगभग उतना ही रहा. लेकिन कांग्रेस का एकदम से अधिसंख्या में गिर गया और ‘आपÓ का भारी संख्या में बढ़ गया. कांग्रेस जैसे बड़े संगठन जिसने 2013 से पहले 15 सालों तक तीन टर्म में लगातार राज्य शासन पर खुद के बहुमत से कब्जा रखा उसके प्रति जनता की इतनी निराशा या उपेक्षा निश्चित ही संगठन की भारी कमजोरी है.Ó ‘आपÓ की जीत उनकी खुद की कमाई नहीं है यह ‘बाई पोलरÓ ध्रुवीकरण का कमाल है.

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