केन्द्रीय वेतन आयोग ने केन्द्र सरकार के अधिकारियों/ कर्मचारियों के वेतन/भत्तों में 24 प्रतिशत तक की वृद्धि की है. भत्तों में मुख्य रूप से महंगाई भत्ता होता है. सालाना वेतनवृद्धि 3 प्रतिशत और भत्ते 67 प्रतिशत तक, महंगाई भत्ता 50 प्रतिशत, ग्रेच्युटी सीमा 10 से 20 लाख तक 25 प्रतिशत बढ़ायी गई है. केन्द्रीय कर्मचारियों पर भी वन रैंक वन पेंशन लागू की गई है. केन्द्र सरकार की स्वीकृति के बाद से अनुशंसाएं एक जनवरी 2016 से लागू होंगी. इसके बाद अब राज्य सरकार के अधिकारी-कर्मचारी भी वेतन वृद्धि की मांग इसी अनुपात में करेंगे और उनकी भी वेतन वृद्धि स्वाभाविक है.

वेतन आयोग व वेतन वृद्धि तो कुछ वर्षों की समयावधि के बाद आते रहते हैं. इससे पहले 6 आ चुके हैं और यह सातवां हैं. यह सिलसिला चलता ही रहेगा.
महंगाई लगातार हर दिन के हिसाब से बढ़ती जाती है. जब तक नई वेतन वृद्धि आती है तब तक मूल्यों की वृद्धि इससे कई गुना ज्यादा आगे जा चुकी होती है. केन्द्रीय वेतन वृद्धि तो 24 प्रतिशत तक आगे जायेगी और मूल्य वृद्धि कहीं बहुत ज्यादा हो गयी. खाद्यान्न में रोज की वस्तु दाल को ही ले लें जो 12-13 रुपये किलो से 200 रुपये तक आ गयी और अभी भी 150 तक ही उतरी है. चावल की महंगाई चढऩे लगी.

फसलों के समर्थन मूल्य हर साल बढऩे से खाद्यान्नों के भाव तो हर साल बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या वेतन आयोग हर साल और वेतन वृद्धि हर साल होती है. जिस दिन वेतन वृद्धि की अनुशंसा घोषित होती है, उसी दिन वह बढ़ चुके मूल्यों के अनुपात व अनुमान में न कुछ लगने लगती है.

महंगाई भत्ता केवल नाम और कहने में भत्ता है अन्यथा वह वेतन ही है. कई बार मांग होने पर महंगाई भत्ता को वेतन में समाहित भी किया जाकर वह नया वेतनमान बना है. समाज में न सिर्फ केन्द्र व राज्य सरकारों के अधिकारी-कर्मचारी बल्कि वह पूरा वर्ग जो फिक्स वेतन, मजदूरी पर काम करता है, महंगाई से हमेशा त्रस्त रहता है क्योंकि कोई भी वेतन वृद्धि उस पर छा चुकी महंगाई के अनुपात में उसे न्यूट्रेलाइज नहीं करती है. उद्योग व्यापार के वर्ग उनकी आमदनी वस्तुओं के मूल्य बढ़ाकर पा लेते हैं. मजदूर वर्ग भी अपनी मजदूरी बढ़ा लेता है. सबसे ज्यादा वेतनभोगी पिसता है. इनमें उच्च मध्यम वर्ग, निम्न मध्यम वर्ग व श्रमिक वर्ग आता है जो कुल आबादी का 80 प्रतिशत भाग है.

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले ब्रिटिश काल में केवल वेतन होता था. युद्ध के कारण एकदम से वस्तु अïभाव और मूल्य वृद्धि में ‘महंगाई भत्ता’ वेतन के उपवेतन के रूप में आया. ऐसा माना गया कि युद्ध के बाद स्थिति सामान्य हो जायेगी और यह ‘भत्ता’ है वह बंद हो जायेगा. लेकिन युद्ध के बाद आधुनिकता के दौर में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए. शिक्षा-दीक्षा व नयी वस्तुओं के आने से लोगों के जीवन स्तर व जरूरतों में तेजी से फैलाव आया. आज का जीवन स्तर लगातार उन्नत होता जा रहा है- जरूरतें, खर्चे बढ़ रहे हैं. उच्च शिक्षा का खर्च तो आसमान छू रहा है. बच्चों की शिक्षा भी घरेलू बजट का बड़ा हिस्सा है.

अभी तक कोई ऐसा फार्मूला नहीं बन पाया है जिससे फिक्स वेतन वाले तुरंत राहत पा सकें. सरकार ने श्रमिक क्षेत्र में वी.डी.ए. (वेरियेवल डियरनेस एलाउन्स) इनडेक्स पाइंट पर तय किया है. इसका अस्तित्व तक पता नहीं चलता है. पूरा कागजी-दफ्तरी बना हुआ है.

अर्थशाियों की मान्यता है कि यदि किसी फार्मूले से वेतन को महंगाई के साथ चलना बनाया तो अर्थव्यवस्था ही अस्थिर हो जायेगी. यह व्यवहारिक नहीं है, लेकिन मूल्यों का लगातार बढ़ते रहना भी जनजीवन के लिये व्यवहारिक नहीं है और वेतन के रूप में निश्चित आय का व्यक्ति सबसे ज्यादा शोषित और असंतुष्टï है.