सरकारी उपक्रम कोल इंडिया जो अभी तक भारत की कोयला जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा था और विदेशों से आयात करना पड़ता था, उसने स्थिति को पलटकर अभाव से आधिक्य (इस्केयरसिटी टू सरपलस) में बदल दिया. इसके साथ आयात पर खर्च होने वाले खर्च मेंं 28 हजार करोड़ रुपयों की बचत हो गयी.
अभी तक कई बिजली घर कोयला की कमी से पूरी क्षमता में विद्युत उत्पादन नहीं कर पा रहे थे. उनमें मध्यप्रदेश के सतपुड़ा ताप विद्युत गृह में भी जिनके कई यूनिट कोयला की कमी हो जाने से बार-बार बंद करने पड़ते थे.

हालत इतनी नाजुक हो गयी थी कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान केंद्र सरकार की कोयला आवंटन में कमी किये जाने के विरोध में भोपाल से सारणी कोयला खदानों तक लांग मार्च का सत्याग्रह भी कर आये थे. इस स्थिति को ‘क्रीटीकलÓ और सुपर क्रीटीकल तक कहा जाने लगा था. विद्युत की कमी से सामान्य जनजीवन, कृषि व उद्योग धंधे भी प्रभावित हो रहे थे. अब कोल इंडिया ने स्थिति में व्यापक परिवर्तन कर दिया कि ताप विद्युत गृहों के पास 27 दिन की जरूरत का कोयला भंडार रहने लगा है. कोल इंडिया ने अब तक का सबसे ज्यादा रिकार्ड उत्पादन 637 मिलीयन टन का कर लिया है.

इस रिकार्ड के साथ कोल इंडिया ने पूरे देश को भू-अर्जन में ऐसी दिशा दी है कि जो अभी तक सतत् आंदोलनों का मूल आधार बना था, ठीक उसके विपरीत लोगों ने स्वयं होकर अपनी जमीनें कोयला खनन के लिये कोल इंडिया को दी और उसकी वजह से देश का कोयला उत्पादन भी दो वर्षों में बढ़कर 637 मीट्रिक टन पर आ गया. औद्योगिक विकास के लिये सबसे बड़ी उलझन बने भूमि अधिग्रहण के क्षेत्र में सरकारों व उद्योगों को नयी अत्यन्त सुखद प्रणाली थी. जिसमें आन्दोलन की जगह सद्भाव पैदा हो गया. देश ने यह दौर भी देखा है कि मेधा पाटकर का नर्मदा विस्थापित आन्दोलन देश का सतत् चलने वाला स्थाई आन्दोलन मान लिया गया है- जो हमेशा चलता रहेगा क्योंकि उसका कोई निदान या समाधान नहीं है.

बंगाल में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध ममता बनर्जी ने ऐसा आन्दोलन चलाया कि टाटा ने वहां नैनो कार प्लान्ट लगाना ही रद्द कर उसे गुजरात व उत्तराखंड ले गये.
कोल इंडिया ने नई कोयला खदानों के लिए 10 हजार हेक्टेयर जमीन लोगों से अधिग्रहीत की है. उसने यह आफर दिया था कि हर दो एकड़ भूमि पर भूस्वामी के परिवार को कोल इंडिया में एक नौकरी देगा. उसने जहां जमीन ली वहीं उस पर रोजगार देकर विस्थापित नहीं होने दिया. कोल इंडिया का उत्पादन जो 2014-15 में 6.7 प्रतिशत था वह बढ़कर 15-16 में 9 प्रतिशत हो गया है.

कोल इंडिया को 3500 हेक्टेयर भूमि पर वन विभाग से जंगल की भूमि पर खनन करने की अनुमति बन गयी है. कोल इंडिया का लक्ष्य है कि 2020 तक देश का कोयला उत्पादन एक बिलियन टन होना चाहिए. उड़ीसा और झारखंड कोयला क्षेत्रों में तीन नई रेल लाइनें डाली जा रही हैं. रेलवे रेक की संख्या बढ़ायी जा रही है इससे अभी जो ढुलाई हो रही है वह 300 मिलीयन टन और अधिक हो जायेगा.
कोयला के क्षेत्र में कोल इंडिया ने भारत को आत्मनिर्भर बना दिया है.

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