kohinoor1नयी दिल्ली,  करीब पौने दो सौ साल पहले अंग्रेज़ों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह से हथियाये गये कोह-ए-नूर हीरे को ब्रिटिश शासन से वापस लेने की मांग आज लोकसभा में जोरदार ढंग से उठी और उच्चतम न्यायालय में इस बेशकीमती रत्न को महाराजा दलीप सिंह द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को तोहफे में देने संबंधी बयान की कड़ी आलाेचना की गयी।

बीजू जनता दल के भर्तृहरि मेहताब ने शून्यकाल में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि 1849 में द्वितीय अंग्रेज-सिख युद्ध में सिखों की पराजय के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौज़ी ने कोह-ए-नूर को महराजा रणजीत सिंह के 11 वर्षीय पुत्र दलीप सिंह से धोखे से छीन कर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को भेंट कर दिया था। श्री मेहताब ने सदन में 1849 में लार्ड डलहौज़ी के सचिव टी ए मेडोक द्वारा लिखे गये एक पांच पृष्ठ के पत्र की प्रति पेश की और उसके अंतिम पैरा को पढ़ते हुए बताया कि महाराजा रणजीत सिंह ने 1839 में अपनी वसीयत में इस बेशकीमती रत्न को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ को भेंट करने की बात कही थी।

मगर उनकी वसीयत का यह फैसला लागू नहीं हो पाया। वर्ष 1849 में अंग्रेज़ों और पंजाब के सिख राज्य के बीच संधि की शर्त के अनुरूप कोह-ए-नूर ब्रिटेन की महारानी के पास पहुँच गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह रत्न कभी भी अंग्रेजों को तोहफे के रूप में नहीं दिया गया था बल्कि उसे धोखे से छीना गया था। उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के वर्ष 2010 के एक बयान को भी उद्धृत किया कि अगर कोह-ए-नूर एवं अन्य सामानों को उनके वैधानिक स्वामियों को वापस कर दिया गया तो फिर ब्रिटिश संग्रहालय खाली हो जाएगा।

श्री मेहताब ने कहा कि सनातन मान्यताआें के अनुसार कोह-ए-नूर को समन्तक मणि भी माना जाता है जिसे पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में जामवंत ने भगवान श्रीकृष्ण को भेंट किया था। उन्होंने कहा कि ऐसी मान्यता है कि इस मणि को कोई महिला धारण कर सकती है अथवा यह भगवान के पास ही रह सकती है। उन्होंने इस मणि के लिये भगवान जगन्नाथ को ही वास्तविक हकदार बताया। उन्होंने कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा है कि कोह-ए-नूर को ब्रिटिश शासन को तोहफे में दिया गया था।

जब टीपू सुल्तान की तलवार भारत आ सकती है तो सरकार को कोह-ए-नूर को वापस लेने का गंभीर प्रयास करना चाहिये। अदालत में अपने रुख को ठीक करना चाहिये। इस पर शिरोमणि अकाली दल के प्रेमसिंह चंदूमाजरा ने सहमति जताते हुए कहा कि अंग्रेजों का यह कहना कि महाराजा दलीप सिंह ने ब्रिटिश महारानी को भेंट किया था, सरासर गलत है। आखिर एक 11 साल का बच्चा क्या भेंट करेगा। उन्हें कैद करने ले जाया गया था और जबरदस्ती कोह-ए-नूर को ब्रिटिश महारानी को दिलवाया गया था। अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह की वसीयत का अनुपालन नहीं करवा कर धोखा किया था।

उसे कभी भी तोहफे के रूप में नहीं दिया गया। श्री चंदूमाजरा ने कहा कि संसद में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित होना चाहिये और सरकार को उसके अनुसार कोह-ए-नूर को वापस लेने का प्रयास करना चाहिये। श्री मेहताब के इस मुद्दे के साथ बीजद एवं अकाली दल के अनेक सांसदों के साथ शिवसेना के चंद्रकांत खैरे ने भी स्वयं को संबद्ध किया।

भारतीय जनता पार्टी की श्रीमती मीनाक्षी लेखी ने सरकार के पक्ष की सफाई देते हुए कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने कोह-ए-नूर के बारे में उच्चतम न्यायालय में जो कहा था, वह पुराभिलेखों के आधार पर कहा था, वह सरकार का विचार नहीं था। उन्होंने इसके लिये मीडिया के दुरुपयोग किये जाने का आराेप लगाते हुए कहा कि मीडिया ने सॉलिसिटर जनरल के पक्ष को सही परिप्रेक्ष्य में पेश नहीं किया ।