भोपाल के गैस पीडि़तों व इंदौर के विकलांगों जिसमें एक दिन के बच्चे भी शामिल हैं उन पर दवाइयों का प्रयोग व परीक्षण करके देखना अत्यंत अमानवीय कृत्य कर दिया गया. डॉक्टरों से इस घृणित कार्य की कभी भी अपेक्षा नहीं की जा सकती. जन हित याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय भी स्तब्ध रह गया. उसने मध्यप्रदेश व केंद्र सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा है. आमतौर पर मेंढक, चूहा, खरगोश व बंदर पर ऐसे प्रयोग होते रहे हैं. अब वैज्ञानिक उपकरणों व शोध से ऐसे प्रयोग करने के अनेक अन्य तरीके व तकनीक निकल आई है.

अमेरिका व यूरोप में कभी ऐसे प्रयोग जघन्य अपराधियों पर किये गए हैं लेकिन इलाज के लिए भर्ती किन्हीं मरीजों पर यह प्रयोग करना उसे मौत के मुंह में ढकेलना साबित हुआ. भोपाल के गैस अस्पताल में जिन 13 मृतकों पर यह प्रयोग कियेे गए उनमें से 12 गैस पीडि़त थे. इंदौर में विकलांगों व नवजात शिशुओं पर यह प्रयोग कर डाला. दिसम्बर 1984 की गैस त्रासदी में जितने लोग मरे इन प्रयोगों से लगभग उतने ही मर गए. पिछले 4 सालों में 2 हजार से ज्यादा की मौतें हो चुकी हैं. इनमें से केवल 12 मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया गया. दवा निर्माता कंपनियां भी डॉक्टरों का इस्तेमाल मरीज के हित से ज्यादा अपने व्यापार के लिए कर रही हैं. जिस तरह राजनीति में नेताओं का अपराधीकरण बढ़ रहा है उसी तरह डॉक्टरों का भी दवाई कंपनियों ने व्यापारीकरण कर दिया है. इन दोनों पर सर्वोच्च न्यायालय सतर्क हो गया है और आम आदमी को भी आगे आना चाहिए.

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