• नेशनल अवार्ड से सम्मानित प्रदेश की पहली विज्ञान संचारिका सारिका घारू से खास बातचीत

होशंगाबाद जिले के ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत् नवाचारी विज्ञान शिक्षिका हैं. वह अपने विद्यार्थियों के साथ-साथ आदिवासी क्षेत्र के बच्चों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि जाग्रत करने के लिए समर्पित मेंटर के रूप में कार्य कर रही हैं. वह विगत एक दशक से खगोलीय घटनाओं के पीछे चले आ रहे अंधविश्वास और तथाकथित मान्यताओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक तथ्यों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास करती आ रही हैं.

सारिका को भारत सरकार ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फरवरी को नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया है. प्रदेश के किसी टीचर को यह प्रथम बार सम्मान मिला है. इससे पहले भी उन्हें उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए प्रदेश भर में दर्जनों पुरस्कार-सम्मान पत्र प्राप्त हो चुके हैं.

हाल ही में नवभारत ने उनसे बातचीत की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

विज्ञान संचार क्या है?

सारिका- विज्ञान संचार के अंतर्गत विभिन्न प्रदर्शनों या अन्य क्रियाकलापों के द्वारा विज्ञान के विविध पहलुओं और तथ्यों को सरल रूप में आम लोगों तक पहुंचाना और इसके लिये वर्तमान में प्रचलित सभी संचार माध्यमों जैसे प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, सोशल मीडिया की मदद लेना शामिल होता है.

आमतौर पर वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में जटिल गणनाओं और प्रयोगों को करके उपलब्धि हासिल करते हैं. स्कूली पाठ्यक्रमों में भी बड़े सूत्र और सिद्धांत लिखे होते हैं लेकिन आम लोगों को सरल भाषा में वैज्ञानिक तथ्य समझाना विज्ञान संचार के अंतर्गत आता है.

आपने विज्ञान संचार के लिये किस विधा को अपनाया है?

सारिका- मैंने खगोल विज्ञान को विशेष रूप से चुना है. इसमें राहु-केतु की मान्यताएं, ग्रहण, ग्रहों का सीध में आना, पुष्य नक्षत्र, पंचक योग, ग्रहों का वक्री होना, हिंदी महीनों का नामकरण, सप्ताह के दिनों के नामकरण जैसे अनेक पक्ष शामिल हैं, जिनके बारे में समाज में अनेक मिथक हैं. आमतौर पर मीडिया भी इनके अंधविश्वासी पक्ष को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है.

इनके बारे में भारतीय खगोलविज्ञान के मॉडल की मदद से मैं भोपाल के चिनार पार्क में या अन्य स्थानों पर आम लोगों को प्रदर्शित कर वैज्ञानिक पक्ष को सामने रखने का प्रयास करती हूं. इस वैज्ञानिक सूचना को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिये प्रिंट मीडिया जिसमें सम्माननीय नवभारत भी शामिल है, की मदद मिलती है.

प्रिंट मीडिया की क्लिप को मैं सोशल मीडिया की मदद से अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की कोशिश करती हूं. खगोलविज्ञान के अलावा विभिन्न वैज्ञानिकों की जयंती, इसरो की उपलब्धि, पर्यावरण दिवस पर भी मैं वैज्ञानिक जागरूकता गतिविधियां करती हूं.

आपने अपने अभियान के लिये मध्यप्रदेश के किन क्षेत्रों को चुना है?

सारिका- मैं अपने गृह जिले होशंगाबाद के अलावा आदिवासी बहुल अलीराजपुर, अनूपपुर, मंडला, सिवनी, छिंदवाड़ा, बैतूल, शहडोल में 200 से अधिक कार्यक्रम कर चुकी हूं. इसके अलावा भोपाल में विगत पांच वर्षों में 100 से अधिक वैज्ञानिक जागरूकता के कार्यक्रम किये हैं.

आपको इन कार्यक्रमों के लिये आर्थिक मदद किस प्रकार मिलती है?

सारिका- मैं 90 प्रतिशत कार्यक्रम स्वयं के वेतन से ही करती हूं. शेष 10 प्रतिशत कार्यक्रमों में जब स्त्रोतों विद्वान के रूप में बुलाया जाता है तो जागरूकता का प्रयास करती हूं. इसके लिये मैं रविवार या किसी अवकाश के दिन ही कार्यक्रम करती हूं. अगर कोई खगोलीय घटना कार्य दिवस पर होती है तो अवकाश ले लेती हूं.

विज्ञान संचार में क्या चुनौतियां आती हैं?

सारिका- मैं अपने निवास से 150 किमी दूर अकेले भोपाल आती हूं. यहां नये लोगों के बीच वैज्ञानिक तथ्य को रखना, चिनार पार्क में व्यवस्थायें जुटाना, मीडिया से संपर्क करना जैसे सामान्य प्रयास करने होते हैं. आमतौर पर लोगों का सहयोग मिलता है.

विज्ञान संचार में महिलाओं की क्या स्थिति है?

सारिका- आज मूल विज्ञान की कक्षाओं में लड़कियों की संख्या तो बढ़ी है. छात्राएं मेरिट में भी स्थान बना रही हैं. लेकिन पारिवारिक परिवेश के कारण वे उन्हीं मान्यताओं में बंधी नजर आती हैं जो पहले से हैं.

कम्प्यूटर सेंटर हो या कोई अन्य प्रशिक्षण संस्थान छात्राओं की संख्या तो अधिक होती है और वे निर्देशित बातों को तो गुणवत्ता से पालन करती नजर आती हैं लेकिन निर्णय लेने के मामले में पुरुषों पर निर्भरता अभी बनी हुई है. महिलाओं में निर्णय लेने की स्थिति को सहज करना आवश्यक है. जब महिलाएं विज्ञान संचार का उत्तरदायित्व लेंगी तो पूरा समाज अपने आप वैज्ञानिक रूप से जागरूक हो सकेगा.

विज्ञान संचार में प्रदेश के शासन से क्या अपेक्षाएं हैं?

सारिका- महिलाओं और किशोरियों में बाल विवाह, कुपोषण रोकने जैसे प्रयासों के लिये तो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा सम्मान दिया जाता है लेकिन महिलाओं के बीच वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के लिये प्रोत्साहन पुरस्कार अभी नहीं दिये जाते हैं. राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के समान जुलाई से दिसंबर के बीच राज्य विज्ञान दिवस का भी आयोजन किया जा सकता है. तब स्कूलों में इसे ठीक से मनाया जा सकेगा. शासन के जनसंपर्क विभाग में भी वैज्ञानिक खबरों को स्थान दिया जाना चाहिये.

विज्ञान संचार के लिए अन्य क्या कदम उठाये जा सकते हैं?

सारिका- अखबारों में विज्ञान समाचारों को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिये, जितना धर्म-कर्म के पन्ने को दिया जाता है. किसी भी विज्ञान समाचार में सिर्फ वैज्ञानिक पक्ष को दिया जाना चाहिये. धार्मिक पक्ष के लिये अलग कॉलम होना चाहिये. किसी खगोलीय घटना के समाचार में चार लाईन वैज्ञानिक तथ्य की पढऩे के बाद अंतिम लाईन जब यह रहती है कि तुला राशि वालों के लिये यह घटना अशुभ है तो पूरे समाचार का मनोविज्ञान धार्मिक डर पैदा करता दिखता है.

अन्य कोई संदेश आप देना चाहेंगी?

सारिका- वर्तमान युग सोशल मीडिया का है. इसमें अनेक भ्रामक तथ्य नासा या इसरो या डीएसटी का नाम लेकर वायरल किये जा रहे हैं. इसके लिये विज्ञान संचारकों का मान्यता प्राप्त समूह इनका तत्काल स्पष्टीकरण करे, यह प्रयास होना चाहिये. भ्रामक, अवैज्ञानिक तथ्यों के वायरल करने पर भी रोक होनी चाहिये.

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