मौसम वैज्ञानिकों ने विश्व को चेतावनी दे दी है कि अगले मानसून के समय काल में आने वाला ‘अलनीनो’ इतना भयावह होगा जितना पहले 15 सालों में नहीं हुआ.

तीन महासागरों- प्रशांत महासागर, हिन्द महासागर और अटलान्टिक महासागरों में प्रशांत सबसे बड़ा है. गर्मी के मौसम में हर महासागर, समुद्रों के साथ-साथ पृथ्वी का तापमान बढ़ जाता है और उसी से जमीन में उर्वरा शक्ति आती है और मानसून की वर्षा निर्मित होती और बरसती है. जब किन्ही भौगोलिक व जलवायु कारणों से प्रशांत महासागर का पानी सामान्य वर्षों की अपेक्षा ज्यादा गर्म हो जाता है. उसे अलनीनो कहा जाता है और उससे दुनिया भर में मौसम उलट-पुलट और विकृत हो जाते है. इसके प्रभाव कहीं तो भारी वर्षा व भू-स्खलन और प्रलंयंकारी बाढ़ आती है और कहीं सूखा, अकाल व जंगल में दावानल आग लगती है.

इसके प्रभाव से भारत, इंडोनेशिया और आस्ट्रेलिया में सूखा या अकाल की स्थिति निर्मित होती है. इस अल नीनो का असर महाद्वीपों में सबसे ज्यादा इंडोनेशिया दूसरे नंबर पर आस्ट्रेलिया पर होता है. क्योंकि ये दोनों प्रशांत महासागर में आने वाले महाद्वीप है और सबसे कम असर भारत पर होता है क्योंकि प्रशांत से दूर हिन्द महासागर का महाद्वीप है, पर प्रशांत के पास होने से उस पर कुछ कम असर जरूर पड़ता है. इस साल भारत में सामान्य से कम वर्षा हुई है वह प्रशांत पर बने अल नीनो का ही असर था. जैसी की चेतावनी दी जा रही है कि अगला अलनीनो वहां भयावह होगा तो उसका असर भारत पर इस साल गुजरे साल से ज्यादा होगा. वर्षा और कम हो सकती है और फसलों को भी नुकसान होगा.

हालांकि यह अलनीनो अगले मानसून के समय गर्मी के खत्म होते दिनों और वर्षा के आगमन काल में होगा- उसमें अभी काफी समय है लेकिन इस समय में हमें अपने खाद्यान्न प्रबंधन में पूरी तैयारी अभी से कर लेनी चाहिए. खाद्यान्नों की काफी बचत की जाए जिनमें अभाव है उनका अभी से आयात कर लिया जाए. हर जगह तालाब व हर गांव में छोटे जलाशय बना लिये जायें कि उन दिनों में पहले हल्ले में जो जोरदार वर्षा होगी उसका पानी इन जलाशयों में जमा हो जाए और कम वर्षा के समय जल आपूर्ति बनी रहे.

पिछले बड़े अलनीनो के प्रभाव में इंडोनेशिया में भारी तबाही आई थी. वहां कई ज्वालामुखी फूट पड़े और जंगलों में भारी आग लग गयी है. जिनका धुआं पहली बार पास के पड़ोसी राष्ट्र सिंगापुर व मलेशिया तक फैल गया और उन राष्ट्रों में कई दिनों तक धुंधलका बना रहा. लोगों को सांस लेने के लिए मास्क पहनना पड़े थे. भारत में इतनी भयावह स्थिति नहीं आयी है. हमारी सबसे बड़ी समस्या खाद्यान्न और पानी की है. इतने बड़े भू-भाग और सवा सौ करोड़ की आबादी की खाद्यान्न व पानी जरूरत पूरी करनी पड़ती है.

मौसम वैज्ञानिकों का अध्ययन भी बताता है कि वैश्विक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अल नीनो जैसे खतरे बढ़ गये हैं. पहले कई वर्षों में एक बार साधारण उष्मता का अल नीनो आता है. अब यह बहुत जल्दी-जल्दी आने लगा है. दुनिया में जितनी जल्दी सौर ऊर्जा का विकास होगा उतनी ही जल्दी वैश्विक उष्मता में कमी भी आ जायेगी. दुनिया भर के उद्योगों में कोयला जलाया जा रहा है. इसका परोक्ष रूप भी यही है जो बिजली से चलते हैं उन बिजली घरों में कोयला जलाने से (थरमल) बिजली बनती है.

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