बेमौसम की बरसात में रबी फसलों के बिगड़ जाने से अब पूरी तैयारी इस बात की है कि खरीफ फसलों का उत्पादन बढ़-चढ़कर पूरा हो. लेकिन रबी की अत्याधिक वर्षा के बाद में खरीफ में यह अंदेशा हो रहा है कि वर्षा 12 प्रतिशत तक कम रह सकती है. वैसे भी पिछले कई वर्षों में देश में वर्षा औसत लगभग 11 प्रतिशत कम ही चल रही है. लेकिन जब खेती के क्रम के अनुरूप पानी गिरता व रुकता रहा उस मौसम में फसलें कम वर्षा के बाद भी बम्पर आयी थीं. गत रबी मौसम में वर्षा अवश्य 11 प्रतिशत कम थी लेकिन सभी फसलें बम्पर आयी थी.

अब यह हर साल की शासकीय परम्परा हो गई है कि दोनों रबी और खरीफ फसलों के भावों में समर्थन मूल्य से वृद्धि की ही जायेगी. इस मामले में यह विचार भी अब लोगों के जहन में आने लगा है कि समर्थन मूल्य से कब तक और कहां तक खाद्यान्नों के भाव बढ़ाते जायेंगे. इसकी भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए.
बाजारों में सोना-चांदी व अन्य सभी वस्तुओं के भाव मांग और पूर्ति के आधार पर तय होते हैं, लेकिन समर्थन मूल्यों के मामलों में सरकार व किसानों की हर बार यही दलील रहती है कि खेती की लागत बढ़ी है इसलिये समर्थन मूल्य भी बढ़ाये जायें. खेती की लागत में चार चीजें प्रमुख होती हैं- बीज का दाम, रसायनिक खाद के भाव, कीटनाशकों के भाव और सिंचाई की दरें.

सरकार ही फसलों का समर्थन मूल्य तय करती है और सरकार ही रसायनिक खादों का मूल्य तय करती है. इधर समर्थन मूल्य बढ़ाया और उधर रासायनिक खाद के भाव बढ़ा दिये. सिंचाई व बिजली की दरें भी सरकार तय करती है. सरकार को चाहिए कि वे इन सभी वस्तुओं के और फसलों के भाव एक निश्चित राशि पर स्थिर कर दें. सरकार को यह भी देखना चाहिए कि समर्थन मूल्य बढऩे से उपभोक्ताओं के खाद्यान्न के भाव ऊंचे हो जायेंगे और रिजर्व बैंक उसे खाद्यान्नों में मूल्य वृद्धि और मुद्रास्फीति मानकर उस पर अपनी मौद्रिक समीक्षा तय करता है. बैंक दरें ऊंची रहती हैं और उसका खामियाजा उद्योग व व्यापार जगत को भुगतना पड़ता है. औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादों की लागत बढऩे से ही निर्यात घटा है. विश्व बाजार में जो देश प्रतिस्पर्धा में है उनकी पूंजी और निवेश सस्ती होने से उनकी लागत कम और बाजारों में मूल्य कम होते है. सरकार को कृषि लागत की तरह औद्योगिक लागत को भी सस्ती पूंजी और निर्यात सबसिडी देनी चाहिए.

अभी खरीफ मौसम में खाद्यान्नों के समर्थन मूल्यों की वृद्धि की गई है. इसमें धान पर 50 रुपया प्रति क्विंटल बढ़ाकर उसे 1360 रुपयों से 1460 कर दिया. दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिये इनके समर्थन मूल्यों में 75 रुपये तक की बढ़ौत्री की गयी है. इस पर 200 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी दिया जायेगा. तूअर 275 रुपये से बढ़कर 4625 रुपए प्रति क्विंटल, उड़द भी 275 से बढ़कर 4625 और मूंग 250 रुपये बढ़कर 4850 हो गयी है. मक्का 15 रुपये बढ़कर 1325 रुपये कर दिया गया है. ये भाव 1 अक्टूबर 2015 से लागू होंगे और सरकारी खरीद होगी.