वर्षा को लेकर दोनों तरह के अनुमान हो रहे हैं कि यह सामान्य से कम हो सकती है, अल नीनो का प्रभाव होगा और यह भी अनुमान है कि वर्षा लगभग सामान्य ही रहेगी. बहुत मामूली सी कमी आ सकती है. पिछले वर्ष वर्षा औसत से 11 प्रतिशत कम थी लेकिन फसलें बम्पर आयी थी. क्योंकि वर्षा के अंतराल कृषि के अनुसार चले थे. गर्मी की बैमौसम बरसात ने ही असाधारण स्थिति में फसलें बिगाड़ दी थी.
इस बार यदि वर्षा में कमी भी आयी तो वह पिछले बार मात्र…. एक प्रतिशत कम 12 प्रतिशत हो सकती है. यह कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है. कम वर्षा आशंका है और सामान्य वर्षा हो जायेगी. इसके लक्षण दिखाई दे रहे हैं. यदि पक्षी ज्ञान को अंधविश्वास न माना जाए और यह माना जाए कि उसका भी प्राकृतिक विज्ञान होता है तो इस साल बरसात अच्छी तीन महीने तक होगी. क्योंकि टिटहरी और पपीहा पक्षी प्रकृति के मौसम विज्ञानी माने जाते है. टिटहरी अपने स्वर संगीत को एक से लेकर 4 ताल देकर पूरा करती है और किसान यह मानता है कि उन तालों के आधार पर उतने माह वर्षा होगी. बताया जा रहा है कि इस बार टिटहरी स्वर संगीत को तीन ताल (कूक) पूरा कर रही है, इसलिए इस साल तीन माह वर्षा होगी. इस साल सामान्यजन यह भी देख लें कि टिटहरी वाला ज्ञान कितना सही होता है.

भारत की कृषि इतनी उन्नत हो चुकी है कि अब कम वर्षा का ज्यादा असर नहीं होता, लेकिन ज्यादा और बेमौसम वर्षा का दुष्प्रभाव अवश्य हो जाता है जैसा कि इस साल की बेमौसम बरसात से हो गया. पिछले 10 सालों से देश में सामान्य से कम वर्षा हो रही है लेकिन उसका कृषि व जनजीवन पर प्रभाव नगण्य ही रहा. देश के 18 राज्यों और 580 जिलों में सिंचाई की व्यवस्था खेती के अनुकूल जमायी जा चुकी है. पिछले साल कम वर्षा के बाद भी 257 लाख टन अनाज पैदा हुआ था, जो पिछले पांच साल के औसत उत्पादन से 81 लाख टन अधिक था. इस साल यदि वर्षा कम भी हुई तो कृषि पर बहुत मामूली असर होगा. ज्यादा से ज्यादा 3 प्रतिशत उत्पादन कम हो सकता है.

इस समय देश में अनाज का भरपूर भंडार है जो हमारी जरूरत से ज्यादा है. इस समय 164 मिलीयन टन इस्तेमाल में है और 31 मिलीयन टन बफर स्टाक में है. अनाज का रिजर्व पिछले साल से ज्यादा है. खरीफ फसलों के लिये कम वर्षा की स्थिति में भी बिजली, डीजल व खाद काफी है और कृषि पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

हमारी वर्षा आधारित जल विद्युत क्षमता मात्र 21 प्रतिशत है बाकी 79 प्रतिशत ऊपरी थरमल (ताप) और न्यूक्लियर है. 25 राज्यों ने कुल 60 लाख टन यूरिया खाद मांगा है और उन्हें इससे कहीं अधिक 90 लाख टन दे दिया गया है. वर्षा की कमी की स्थिति में किसानों को सिंचाई पम्पों के लिये डीजल पम्पों से सिंचाई करने के लिये 10 रुपये लीटर सबसिडी दी जा सकती है.

इस देश में गेहूं का उत्पादन घटने के बावजूद इसका समर्थन मूल्य पर खरीद पिछले साल से 2 प्रतिशत ज्यादा रही. दालों के उत्पादन में कमी पिछले 20 साल से चली आ रही है और हम अपनी जरूरत की 40 प्रतिशत दाले हर साल आयात कर रहे हैं. इसका उत्पादन बढ़ाया जा रहा है और उसमें मध्यप्रदेश सबसे आगे है. इस साल दालों के भाव तेजी से ऊपर जा रहे हैं. भावों में 50 से 60 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है. पहली बार केंद्र सरकार ने यह फैसला किया है कि फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया अब दालों का भी बफर स्टाक बनायेगा और किसानों से सीधा समर्थन मूल्य व खरीदी करेगा. भाव बढऩे पर खुले बाजार में दाल उतार दी जायेगी. खाद्यान्न निगम दालों का आयात भी करने जा रहा है.

Related Posts: