इस समय भारत में फिर से खाद्यान्नों की मूल्य वृद्धि का दौर आया है. शक्कर में कमी निर्यात की मांग न होने से मिलों पर संकट आया हुआ है. सरकार से प्रार्थना की गयी है वह बफर स्टाक बनाने की वस्तुओं में शक्कर को शामिल करे और खाद्यान्नों की तरह उसकी भी सरकारी खरीद हो. अभी तक पिछले कई दशकों से खाद्य तेलों व दालों का भारी मात्रा में आयात हो ही रहा है. इस बार फसल बिगडऩे से इनका आयात और बढ़ गया. मुसीबत में मुसीबत की कहावत में अब प्याज का आयात भी करने का विचार हो रहा है. उसकी कमी भी महसूस की जा रही है. इस मामले में पहला कदम तो यह उठाया गया है कि उसका निर्यात करना निर्यात की कीमतें बढ़ा कर दिया गया. इससे निर्यात में गिरावट आयी. लेकिन न सिर्फ लासल गांव जो एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी है, वहां के किसान यह शिकायत करने लगे कि निर्यात रुकने से प्याज के थोक व्यापारियों ने प्याज खरीदी के भाव भी कम कर दिये हैं. इस साल प्याज के रिटेल भाव 40 प्रतिशत तक बढ़ गये हैं. यह एकदम से 24 रुपये से 34 रुपये किलो हो गया. सरकार ने भी निर्यात रोकने के लिये इसका निर्यात मूल्य 250 डालर प्रति टन से बढ़ाकर 425 डालर प्रति टन कर दिया. लासल गांव मंडी में इसके भाव 11 रुपये किलो से बढ़कर 17 रुपये प्रति किलो हो गये. बेमौसम बरसात ने महाराष्ट्र व गुजरात में प्याज की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है.

गेहूं का देश में सरप्लस होना और साथ ही साथ उसका भारी मात्रा में आयात भी होना ‘विचित्र किंतु सत्यÓ की कहावत का प्रमाण बन गया है. सरकार गेहूं पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाकर उसका निर्यात रोकने या कम करने का प्रयास करने जा रही है. भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में रखे कम गुणवत्ता वाले गेहूं को बाहर निकालना है. वर्ष 14-15 में गेहूँ की बम्पर पैदावार अवश्य हुई थी. लेकिन बेमौसम बरसात ने उसकी क्वालिटी बिल्कुल बिगाड़ दी. आटा व खाद्य वस्तुओं के निर्माता उद्योग देश में अच्छी किस्म का गेहूं न मिलने के कारण इसका भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं और खाद्य निगम के पास गेहूं का भारी सरप्लस स्टाक ‘डम्पÓ हो रहा है. केंद्र सरकार तो समर्थन मूल्य पर गुणवत्ता विहीन गेहूं समर्थन मूल्य पर ले नहीं रही थी. लेकिन किसान राज्यों में करुण याचना कर रहे थे कि सकार ने नहीं खरीदा तो वे बरबाद हो जायेंगे. इसे अनाज व्यापारी भी नहीं ले रहे हैं. राज्यों के दबाव में केंद्र व राज्यों ने इसे खरीद तो लिया, लेकिन अब यह गेहूं किसानों से हटकर सरकारों के लिए आपदा बन गया कि इसका कोई खरीददार नहीं है. खाद्य निगम हतप्रभ है कि अब इसका करें तो क्या करें.

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर हो गयी है. वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा है कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में कमजोर बनी रहेगी जो भारत सरकार और देश के बैंकों की वित्तीय साख के लिए नकारात्मक है. इसमें मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों की रफ्तार को लेकर कुछ निराशा पैदा हुई है. हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर विश्व बैंक उत्साहित और आशान्वित है. वहीं नीति आयोग के अध्यक्ष श्री अरविंद पनगठिया ने दावा किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पांच साल से पहले ही 3000 अरब डालर के आंकड़े को और आर्थिक विकास दर भी 8 प्रतिशत को पार कर जायेगी.

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