मार्च की बेमौसम बरसात ने इस साल देश का खाद्यान्न उत्पादन काफी हद तक नष्टï कर दिया, वहीं उसकी वजह से पहले से चला आ रहा खाद्य तेलों का अभाव और उसके आयात दोनों में वृद्धि हो गयी. देश में भोजन व्यवस्था (किचन) में अभी भी काफी असंतुलन बना हुआ है और उसमें काफी प्रयास करना और सफलता पाने की चुनौती बनी हुई है.

आजादी के बाद देश में गेहूं, चावल, ज्वार, मक्का, चना सहित मोटे अनाजों का भी काफी अभाव बना हुआ था. हम विदेशों से इनका आयात कर अपनी जरुरतें पूरी करते थे. खाद्यान्न का आयात भारत के बजट पर बहुत बड़ा भार था और हमारे पिछड़ेपन का कारण भी था. लेकिन देश ने खाद्यान्न में आश्चर्यजनक प्रगति कर आज उसके बफर स्टाक में इतना अनाज भरपूर रहने लगा है कि यदि दो साल देश में लगातार सूखा भी आ जाए तो देश में अनाज भरपूर रहेगा.

प्रगति का एक सोपान यह भी है कि हम जो कभी अनाज आयात करते थे अब अनाज दूसरे देशों को निर्यात करने लगे है. इस साल देश में खाद्यान्न की फसलें नष्टï अवश्य हुई है, किसान को भारी आर्थिक हानि हुई है लेकिन इसके बाद भी देश में खाद्यान्न का अभाव नहीं है. लेकिन किचन के मामले में अभी एक विपरीत स्थिति चली आ रही है कि देश में दालों और खाने के तेलों का भारी अभाव है और हमें इनका अपनी जरूरत के लिये भारी खर्च कर आयात करना पड़ रहा है.
देश में दालों की 40 प्रतिशत और खाद्य तेलों में 60 प्रतिशत की कमी है और इतना ही आयात करना पड़ रहा है. लेकिन मार्च की बरसात ने दालों व तिलहनों की फसलें भी चौपट कर दी और इन दोनों वस्तुओं- दाल व खाने का तेल इनका अभाव और ज्यादा बढ़ गया. इस साल खाने के तेल का आयात अभी ही 8 प्रतिशत बढ़कर 127 लाख के नये रिकार्ड स्तर तक पहुंच गया है. पिछले वर्षों 2013 व 2014 में हमारा तेल आयात 116 लाख टन था जो उस तुलना में 23 प्रतिशत बढ़ गया है.

मार्च में कई बार आयी बरसात ने मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात में सरसों, सोया व अन्य तिलहन की खड़ी फसलों को तबाह कर दिया है. रबी की तिलहन फसलों का उत्पादन 10-12 प्रतिशत घट जायेगा. मूंगफली के उत्पादन में 28 प्रतिशत की भारी गिरावट आयी है. इससे रबी की सभी तिलहन फसलों का 17 प्रतिशत गिरकर 77 लाख टन रहने का अनुमान है. तेल उत्पादकों ने कहा है कि तिलहनों का आयात बढ़ाने के लिये इस पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगा हुआ है, उसे घटाकर 10 प्रतिशत किया जाए. प्रयास यह किये जा रहे हैं कि खाद्यान्न तेल के आयात के साथ-साथ तिलहनों का भी आयात किया जाए जिससे तेल मिले और एक्ट्रेक्शन के लाखों छोटे स्थानीय स्तर के प्लान्ट भी चलते रहे. अन्यथा इनके बन्द हो जाने से बेरोजगार भी बढ़ जायेंगे.

अभी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था (पी.डी.एस.) मलेशिया और इन्डोनेशिया से आयात किये जा रहे पाम आइल से चलती है. देश में कृषि के स्तर पर भारत में भी पाम आइल की खेती के प्रयास किये जा रहे हैं. पाम फसल का पौधा न होकर फलों के छोटे पेड़ों के समान होता है.

भारत में बहुत कीमती और बहुत उपयोगी आलिव आइल की खेती के भी प्रयास हो रहे हैं. ये भी मध्यम ऊंचाई का झाड़ होता है.

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