खाद्य सुरक्षा विधेयक पर विद्वेष की राजनीति विरोध की मर्यादा व हदों को पार कर गई. इसे किसी भी तरह विरोध नहीं कहा जा सकता कि संसद में शासन पक्ष को विधायी काम न करने दिया जाए.

संसद में गतिरोध करते रहने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित न हो पाये. उनकी अवांछनीय राजनैतिक सोच यह थी कि इससे आगामी लोकसभा चुनावों में सत्ता पक्ष की यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को चुनावी लाभ होगा. इस तरह की दूषित भावना तो सरकार के हर जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों व विधेयक पर व्यक्त की जा सकती है. इस तरह के विरोधों को भी कोई विधेयक लाकर उसे कानून बनाकर रोका जाना चाहिए या संसद संचालन के नियम व प्रक्रिया बदली जाए. संसद अवरोध में अति की स्थिति आ चुकी है.

नौबत यहां तक आ गई कि अब सरकार को यह फैसला करना पड़ा कि संसदीय प्रक्रिया के अभाव में इसे अध्यादेश से लाया जाए. अब उस पर अड़ंगेबाज विरोध पक्ष भारतीय जनता पार्टी द्वारा यह कहा जा रहा है कि इस पर अध्यादेश न लाया जाए बल्कि संसद में पारित कराया जाए. अजीब राजनैतिक तर्क-कुतर्क हो रहे हैं कि उसे उस तरह होने भी नहीं देंगे और उसे इस तरह भी न किया जाए. इन परिस्थितियों में सरकार का अध्यादेश लाने का निर्णय एकमात्र ही विकल्प है. जन कल्याण के कामों को चुनावी नजर से अवरुद्ध करना कुटिल राजनीति है.

खाद्य सुरक्षा में प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलो गेहूं, चावल या मोटा अनाज 3-2-1 रुपये प्रति किलो पर मिलेगा. इस पर सरकार पर सबसिडी भार 1.31 लाख करोड़ रुपयों का होगा. देश के 110 करोड़ लोगों की आबादी में से 80 करोड़ लोग इससे लाभांवित होंगे जो देश की 67 प्रतिशत आबादी है. इसमें 620 लाख टन अनाज लगेगा. गरीबी रेखा से नीचे बी.पी.एल. राशन कार्ड धारकों को अंत्योदय योजना के तहत 35 किलो अनाज मिलता रहेगा. इसके दायरे में गांवों की 75 प्रतिशत और 50 प्रतिशत शहरी आबादी आ जाती है. इस योजना को लागू करने में 6 माह का समय लग जायेगा. अभी 7 राज्य उनका खुद का सस्ते अनाज का कार्यक्रम चला रहे हैं. गर्भवती महिलाओं को पोषण आहार के लिए 6 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता दी जायेगी.

योजना कितनी भी अच्छी हो यदि उसका क्रियान्वयन ही ठीक न हो तो उस योजना के दुष्परिणाम ही सामने आते हैं. अभी तक खाद्यान्न व्यवस्था की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) चल रही है. इसमें राशन दुकानों का आवंटन सत्ता पक्ष के छुटभैया नेता, जिला प्रशासन से ले भगते हैं और प्रीमियम पर किराये पर उठा देते हैं. दुकानदार राशन कार्ड वालों को उधार रुपया देकर कार्ड गिरवी रख लेते है. अनाज व शक्कर खुले बाजार व आटा मिलों में चला जाता है. घासलेट, पेट्रोल पंपों व मिलावट के लिये या बस-ट्रकों को बेच दिया जाता है. सुप्रीम कोर्ट यह कह चुका है कि पीडीएस की पूरी व्यवस्था ही सरकार से लेकर राशनकार्ड धारी तक भ्रष्टïाचार में आकंठ डूबी है. इसे खत्म कर देना चाहिए.

मनरेगा में यह सामने आ चुका है कि गारंटी के साथ जितने जॉब नहीं मिले उससे ज्यादा के फर्जी जॉब कार्ड बन गए. काम हुए नहीं और रुपया अधिकारी खा गए. यदि यही हाल खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम में हुआ तो इसमें जो एक लाख करोड़ रुपयों की सरकारी सबसिडी आ रही है वह भी भ्रष्टïचार में डूब जायेगी. अनाज बाजार व मिलों में पहुंच जायेगा. योजना बनाने के साथ उसको ठीक से चलाकर सफलता लाना भी सरकार का दायित्व है. यह कहकर बचा नहीं जा सकता कि निचले स्तर पर भ्रष्टïाचार हो जाता है. हर कार्यक्रम का क्रियान्वयन मैदानी स्तर पर ही होता है. खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की भी सुरक्षा होनी चाहिए.
संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
प्रधान संपादक : श्री प्रफुल्ल माहेश्वरी

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