नई दिल्ली,  उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति अगले दो महीने में 5.6-5.8 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है। यह बात ड्यूश बैंक ने एक शोध पत्र में कही जिसमें अनुमान जताया गया कि रिजर्व बैंक नीतिगत दर में और एक बार कटौती कर सकता है।

वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी, ड्यूश बैंक ने कहा कि मुद्रास्फीति और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वृद्धि की आशंका अभी भी बरकरार है और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों से केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की वित्तीय स्थिति पर दबाव पडऩे की संभावना है।ड्यूश बैंक ने एक रपट में कहा, ‘हमें उम्मीद है कि खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के निकट भविष्य के लक्ष्य के अनुरूप अगले दो महीने में 5.6-5.8 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है लेकिन यह हमारे पहले के अनुमान से ऊपर होगी।Ó आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक खुदरा मुद्रास्फीति लगातार छठे महीने बढ़ती हुई जनवरी में डेढ़ साल के उच्च स्तर 5.69 प्रतिशत पर पहुंच गई।

रिजर्व बैंक ने खुदरा मुद्रास्फीति के जनवरी 2016 में 6 प्रतिशत के आसपास और मार्च 2017 में पांच प्रतिशत से नीचे रहने का अनुमान लगाया है। रिजर्व बैंक के नीतिगत उपायों पर रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक अभी भी एक बार और नीतिगत दर में कटौती कर सकता है।
कैसे पार लगाएंगे

बजट से पहले जिस एक सेक्टर पर सबकी नजरें जम चुकीं हैं वो है बैंकिंग। पिछले तिमाही के नतीजों में बहुत सारे एनपीए निकल कर आए हैं। उसके बाद ऐसा लगता है कि अब वित्त मंत्री को बैंकों के लिए काफी बड़े प्रावधान करने होंगे। बैंकों के कैपिटलाइजेशन के लिए काफी ज्यादा रकम ढूढऩी पड़ेगी। जबकि वित्तमंत्री खुद अपने वित्तीय घाटे के लक्ष्य को लेकर संघर्ष कर रहे होंगे। यहां इसी मद्दे पर अपनी खास राय दे रहे हैं एशिया पैसिफिक, बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के चेयरमैन जन्मेजय सिन्हा, आदित्य बिड़ला ग्रुप के प्रेसिडेंट अजीत रानाडे और आईजीआईडीआर की प्रोफेसर राजेश्वरी सेनगुप्ता।

जन्मेजय सिन्हा के मुताबिक एनपीए की बीमारी बहुत बड़ी है। करीब 3000 प्रोजेक्ट अभी भी फंसे हैं। इंफ्रा, स्टील, पावर में दिक्कतें ज्यादा हैं। टेक्सटाइल सेक्टर भी बुरे हालत में है।

टेलीकॉम कंपनियां भी कर्ज में फंसी हुई हैं। जन्मेजय सिन्हा का कहना है कि पीपीपी मॉडल पूरी तरह फेल हो गया। इकोनॉमी में बूम के समय इंफ्रा को खूब लोन दिए गए। लोन मिला, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। फिर प्रोजेक्ट लटकने से मुसीबतें बढ़ गईं। जन्मेजय के मुताबिक सभी प्रोमोटरों पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। बैंकों को नई पूंजी देना जरूरी है। जिसके लिए सरकार को वित्तीय घाटे की फिक्र नहीं करनी चाहिए।

अजीत रानाडे के मुताबिक एनपीए को लेकर आरबीआई काफी सक्रिय है। सरकार के सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटानी चाहिए। बजट में बैंकों के लिए 60-70 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए। रानाडे का कहना है कि बैड बैंक मॉडल को परखने की जरूरत है।

राजेश्वरी सेनगुप्ता का कहना है कि खराब कर्ज की समस्या बहुत बड़ी समस्या है। बैंकों ने जांचे बगैर लोन बांटे। फिर मंदी से दिक्कतें बढ़ गई। इसके साथ ही बैंकिंग के कायदे-कानून कड़े नहीं है। जिसकी वजह से खराब कर्ज को बैंक छुपाते रहे और आरबीआई ने देरी से कदम उठाया। राजेश्वरी सेनगुप्ता का ये भी कहना है कि डीडीआर प्रक्रिया पूरी तरह फेल हो गई है। अब दूसरे उपाय खोजने होंगे। राजेश्वरी की राय है कि बैंकिंग से संबंधित सख्त कानून जल्द बनाया जाएं और सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाना चाहिए

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