काश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड में गर्मी के मार्च महीने में हिमपात व तेज वर्षा का एक दौर प्रकृति के विरुद्ध प्राकृतिक रूप में आया हुआ है. जम्मू क्षेत्र में पिछले चार दिनों से भारी वर्षा हो रही है और तीव्र वर्षा राष्टï्रीय दिल्ली में भी हो रही है.
वहीं राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में तेज आंधी, वर्षा और साथ-साथ ओले भी भारी मात्रा में गिरे हैं. ओला भी भारी हिमपात कहा जाता है. पहाड़ी क्षेत्रों में हिमपात धीरे-धीरे देर तक चलता है. जिस तरह वर्षा सेंटीमीटर में नापी जाती है उसी तरह हिमपात भी बर्फ की परत की मोटाई से सेंटीमीटर में नापा जाता है.

लेकिन ओले हिमपात के विपरीत तेजी से बहुत थोड़े समय के लिये पथरीली बरसात के रूप में मार करता हुआ गिरते हैं और फसल को वजन डालकर झुका देते हैं. इन दिनों उत्तर भारत के राज्यों से होकर मध्य में स्थित राज्यों में वर्षा, हिमपात व ओलों का प्रकोप आया हुआ है. खेतों में रबी की फसलें अपनी पूरी ऊंचाई से भरी हुई बालियां और दाना पड़ जाने से भारी हो चुकी हैं. मार्च में गर्मी से उनके पकने-कटने का मौसम आ जाता है, लेकिन पिछले कई सालों में न सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व में वर्षा, हिमपात व हवाओ और बर्फीले तूफान का कहर आया हुआ है.

इन दिनों में जहां उत्तर अमेरिका महाद्वीप के राष्टï्रों अमेरिका व कनाडा में बर्फीले तूफान और भारी हिमपात विनाशकारी बने हुए हैं, वहीं दक्षिण अमेरिका का सबसे बड़ा राष्टï्र ब्राजील भी मूसलाधार वर्षा से भारी संकट में आ गया है. आमतौर पर अभी यह होता आया है कि पृथ्वी के दोनों गोलार्धों उत्तर व दक्षिण में सूर्य की इस तरफ या उस तरह की स्थिति के अनुसार ही मौसम भौगोलिक दृष्टि से विपरीत प्रकृति के होते हैं. जब भारत में गर्मी आती है तो आस्ट्रेलिया में सर्दी का मौसम होता है. इसी तरह उत्तर व दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपों में विपरीत मौसम रहते हैं, लेकिन दोनों ही जगह एक-सी विपदाएं आयी हुई हैं.

भारत के सामने भी यही बड़ी समस्या आयी हुई है कि मानवीय मूल्यों या विकास गतिविधियों के कारण वैश्विक उष्मता बढ़ जाने के कारण मौसमों का क्रम तो अस्त-व्यस्त हो गया है और उसमें जो परिवर्तन आ गये हैं- उससे कृषि की प्राकृतिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त और नष्टï हो गयी, फसलों का एक मौसम होता है. गेहूं, चना व अन्य फसलें तथा वनस्पति खाद्य वस्तुएं मिर्ची, मटर, गोभी आदि कभी भी बोकर पानी दिया जाए तो वह पौधा तो बन जायेगा, लेकिन उसमें बालें, दानें व फल नहीं आयेगा.

इस समय भारत में यह हालत है कि रबी फसलें पूरी बढ़कर पकने के लिए तैयार हैं उन्हें मार्च-अप्रैल की गर्मी चाहिए और हो यह रहा है कि वर्षा हो रही- ओले गिर रहे और आंधियां चल रही हैं. जब बुआई का मौसम आता है- वर्षा देर से होती है और बुआई में देरी हो जाती हैं या बुआई समय पर अंकुरित
नहीं होती.

मौसम का क्रम बिगडऩे से पूरे विश्व की प्राकृतिक व्यवस्था ऐसी बिगड़ रही है कि मानव का ही रहना दूभर हो जायेगा.

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