GULBARG1अहमदाबाद,   गुजरात के गोधरा में 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे को जलाये जाने के एक दिन बाद यहां मेघाणीनगर इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के परिवारों की रिहायश वाले गुलबर्ग सोसायटी में भीड द्वारा जिंदा जला कर मार दिये गये 69 लोगों, जिनमें कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी शामिल थे, से जुडे चर्चित गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार मामले में एक विशेष अदालत ने आज फैसला सुनाते हुए विश्व हिन्दू परिषद के नेता अतुल वैद्य समेत 24 आरोपियों को दोषी करार दिया तथा भाजपा के तत्कालीन पार्षद विपिन पटेल, कांग्रेस नेता मेघजी चौधरी और पुलिस अधिकारी के जी एरडा समेत 36 अन्य को दोषमुक्त कर दिया।

अदालत ने हालांकि इस मामले को पूर्व नियोजित षडयंत्र मानने से इंकार करते हुए सभी आरोपियाें के खिलाफ लगायी गयी संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी को हटा लिया।

उच्चतम न्यायालय के आदेश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की विशेष अदालत के जज पी बी देसाई ने 24 दोषियों में से 11 को हत्या और अन्य आरोपों तथा 13 को दंगा करने का दोषी ठहराया है। दोषी करार दिये गये विहिप नेता अतुल वैद्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 147, 148, 149, 153, 186, 188, 427, 435, 436 के तहत ही मामला दर्ज किया गया है। उन्हें हत्या अथवा अन्य गंभीर अपराधों का आरोपी नहीं बनाया गया है।

अदालत छह जून को दोषियों की सजा की अवधि के बारे में फैसला सुनायेगी।
दोषमुक्त होने वालों में भाजपा के तत्कालीन पार्षद विपिन पटेल तथा मेघाणीनगर के तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर के जी एरडा भी शामिल हैं।

ज्ञातव्य है कि यहां मेघाणीनगर में स्थित उक्त सोसायटी में यह घटना गोधरा में साबरमती एक्सप्रेेस के एक डिब्बे में आग लगाये जाने के एक दिन बाद यानी 28 फरवरी 2002 को हुई थी। यह मामला गुजरात दंगों से जुडे उन नौ मामलों में शामिल है जिसकी जांच उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2008 में गुजरात की तत्कालीन नरेन्द्र मोदी सरकार को सीबीआई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल गठित करने के आदेश दिये थे।

एसआईटी ने फरवरी 2009 से इस मामले की जांच शुरू की थी। इस मामले में श्री मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये थे पर बाद में एसआईटी ने उन्हें क्लिन चिट दे दी थी। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की रोज सुनवाई तथा बाद में फैसला सुनाने पर रोक लगाने के आदेश दिये थे। गत फरवरी माह में अदालत ने फैसला सुनाने पर रोक हटा ली थी।

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