GULBARG2अहमदाबाद,  गुजरात के गोधरा में 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे को जलाये जाने के एक दिन बाद यहां मेघाणीनगर इलाके में
अल्पसंख्यक समुदाय के परिवारों की रिहायश वाले गुलबर्ग सोसायटी में भीड द्वारा जिंदा जला कर मार दिये गये 69 लोगों, जिनमें कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान
जाफरी भी शामिल थे, से जुडे चर्चित गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार मामले में दोषी
ठहराये गये 24 लोगों को सजा के बिंदु पर यहां एक विशेष अदालत ने आज सुनवाई पूरी कर ली।

अदालत ने विशेष जांच दल यानी एसआईटी से सभी अभियुक्तों के जेल रिकार्ड (किसने जेल में कितना समय गुजारा है और अन्य संबंधित विवरण) 13 जून को इसके समक्ष रखने के आदेश दिये। अदालत के उसी दिन सजा सुनाने की तिथि घोषित करने की संभावना है।

अदालत के कल के आदेश के अनुरूप दोषियों को आज सशरीर इसके समक्ष पेश नहीं किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) के वकील आर सी
कोडकर ने एसआईटी अदालत के न्यायाधीश पी बी देसाई से 24 में से 11 दोषियों
जिन्हें हत्या का दोषी ठहराया गया है को फांसी की सजा की अपनी मांग को आज फिर दोहराया। उन्होंने एक बार फिर इस घटना को ठंडे कलेजे (कोल्ड ब्लडेड)से की गयी हत्या तथा कभी कभार होने वाली घटनाओं में से भी यदा कदा ही होने वाली घटना (रेयरेस्ट ऑफ रेर) करार देते हुए आरोपियों के लिए फांसी अथवा कम से कम उम्रकैद की सजा की मांग की।

उन्होंने बचाव पक्ष की इस दलील काे भी खारिज किया कि यह एक अन्य घटना (गोधरा कांड) की प्रतिक्रिया थी। श्री कोडकर ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बदले की भावना का स्थान नहीं है।

बचाव पक्ष के वकील ने कल सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा था
कि आरोपियों को फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए तथा उन्हें सुधरने का मौका
दिया जाना चाहिए। उन्होंने श्री जाफरी की ओर से घटना से पहले की गयी फायरिंग के कारण उकसावे में आकर जो कुछ भी किया है। इस मामले के लिए तो दरअसल श्री जाफरी की उकसावा भरी कार्रवाई ही जिम्मेदार है।

उन्होंने दलील दी कि आरोपियों ने जमानत के दौरान भी कभी साक्ष्य से छेडछाड का प्रयास नहीं किया। बचाव पक्ष ने अदालत से नरमी का रूख दिखाने की मांग करते हुए कहा कि दोषी ठहराये गये लोग पेशेवर अपराधी नहीं हैं और उक्त घटना स्वर्गीय जाफरी के उस दिन उकसावे वाली गोलीबारी की घटना के कारण हुई। उनकी ओर से की गयी गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गयी थी तथा 15 घायल हुए थे। इस मामले में बाकायदा प्राथमिकी भी दर्ज हुई थी।

अदालत में आज एक बार फिर पीडितों के लिए मुआवजे का मुद्दा भी उठा जिस पर बचाव पक्ष ने कहा कि पीडितों में से अधिकतर ऐसी आर्थिक पृष्ठभूमि से नहीं है कि वह मुआवजे की राशि अदा कर सके।

अदालत ने गत दो जून को इस प्रकरण फैसला सुनाते हुए विश्व हिन्दू
परिषद के नेता अतुल वैद्य समेत 24 आरोपियों को दोषी करार दिया था तथा भाजपा के तत्कालीन और वर्तमान पार्षद विपिन पटेल, कांग्रेस नेता मेघजी चौधरी और पुलिस अधिकारी के जी एरडा समेत 36 अन्य को दोषमुक्त कर दिया था।

अदालत ने हालांकि इस मामले को पूर्व नियोजित षडयंत्र मानने से इंकार
करते हुए सभी आरोपियाें के खिलाफ लगायी गयी संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी को हटा लिया था।

दोषियों में से 11 को हत्या, एक को हत्या के प्रयास और 12 को दंगा करने
और अन्य सामान्य अपराधों का दोषी ठहराया गया है। दोषी करार दिये गये विहिप नेता अतुल वैद्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 147, 148, 149, 153, 186, 188, 427, 435, 436 के तहत ही मामला दर्ज किया गया है। उन्हें हत्या अथवा अन्य गंभीर अपराधों का आरोपी नहीं बनाया गया है।

अदालत ने सजा के बिंदु पर अलग से सुनवाई की बात कही थी। ज्ञातव्य है कि यहां मेघाणीनगर में स्थित उक्त सोसायटी में यह घटना गोधरा में साबरमती एक्सप्रेेस के एक डिब्बे में आग लगाये जाने के एक दिन बाद यानी 28 फरवरी 2002 को हुई थी। यह मामला गुजरात दंगों से जुडे उन नौ मामलों में शामिल है जिसकी जांच उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2008 में गुजरात की तत्कालीन नरेन्द्र मोदी सरकार को सीबीआई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल गठित करने के आदेश दिये थे।

एसआईटी ने फरवरी 2009 से इस मामले की जांच शुरू की थी। इस मामले में श्री मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठाये गये थे पर बाद में एसआईटी ने उन्हें क्लिन चिट दे दी थी। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की रोज सुनवाई तथा बाद में फैसला सुनाने पर रोक लगाने के आदेश दिये थे। गत फरवरी माह में अदालत ने फैसला सुनाने पर रोक हटा ली थी मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आज भी अदालत परिसर के आसपास सुरक्षा के कडे प्रबंध किये गये थे। सुनवाई के बाद दोषियों को वापस साबरमती जेल भेज दिया गया।

ज्ञातव्य है कि उक्त घटना में मारे गये कुल 69 में 30 के शव नहीं मिल सके थे। इसे गुजरात के 2002 के दंगों के सबसे बडे नरसंहारों में से एक माना जाता है।

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