यूरोपीय यूनियन और यूरो मुद्रा का राष्टï्र ग्रीस (यूनान) बड़े आर्थिक संकट के साथ अब उसके जनमत संग्रह के परिणाम के कारण राजनैतिक संकट में भी आ गया है. आर्थिक दृष्टिï से अंदरूनी यूरोपीय यूनियन राष्टï्रों व अंतरराष्टï्रीय मुद्राकोष में वित्तीय नियमों व आधार पर उसे दिवालिया (डिफाल्टर) 25 जून को घोषित किया जा चुका है. उसने अंतरराष्टï्रीय मुद्राकोष (आई.एस.एफ.) से दो साल की मोहलत मांगी और ऐसी ही रियायत वह यूरोप राष्टï्रों से मांग रहा है. यूरोपीय भूमि का जर्मनी व फ्रांस ही निर्णायक भूमिका में बने हुए है. एक तो उन्होंने ग्रीस को दिवालिया घोषित हो जाने दिया और आगे किसी भी आर्थिक मदद के लिये उसे घरेलू वित्तीय व आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करके इस स्थिति में आने को कहा जिससे दुनिया यह जान और विश्वास कर सके कि उन नीतियों व कार्यक्रम के आधार पर आगे राष्टï्रों व वित्तीय संस्थाओं का कर्ज चुका सकेगा. इसे संकट से उबरने का रास्ता (बेल आउट पैकेज) कहा गया. ग्रीस सरकार ने इसे केबीनेट स्तर के मानने के बजाए उसे जनमत संग्रह पर रख दिया कि इसे यूरोपीय यूनियन की बेल आउट पैकेज स्वीकार किया जाए या खारिज कर दिया जाए. प्रधानमंत्री श्री सिपरस इसे रद्द ही कराना चाहते है. जनमत संग्रह मेें 63 प्रतिशत लोगों ने इसे रद्द करने के पक्ष में मत दिया और 39 प्रतिशत ने इसे मानने के पक्ष में मत दिया.

प्रधानमंत्री श्री सिपरस ने निर्णय का स्वागत करते हुए प्रजातंत्र व यूरोपीय सदृढ़ता का प्रतीक बताया. वहीं उनके वित्तमंत्री श्री यनिस वरुकालिस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

मंगलवार को यूरोपीय यूनियन की शिखर बैठक हो रही है जिसमें ïउनके बेल आउट पैकेज को जनमत संग्रह में खारिज किये जाने पर विचार होगा. संभावना इस बात की दिख रही है कि ग्रीस यूरोपीय यूनियन की सदस्यता और यूरो मुद्रा जोन दोनों से बाहर कर दिया जायेगा. उसे अपनी खुद की पूर्ववर्ती मुद्रा में लौटना होगा. यह कल्पना ही ग्रीस, यूरोपीय यूनियन व विश्व आर्थिक जगत के लिये अति संकटपूर्ण होगी कि ग्रीस की मुद्रा को यूरोपीय राष्ट्रों में स्वीकार ही नहीं किया जावेगा. वह यूरो से ‘डी लिंक’ हो जायेगा फिर उसकी मुद्रा का अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक जगत में इतना अवमूल्यन हो जायेगा कि हो सकता है कि वह दुनिया की सबसे कमजोर मुद्रा बन जाए.

आज विश्व का आर्थिक जगत और व्यापार इतने अन्तरनिहित हो गये हैं कि एक का संकट अन्य राष्ट्रों को परेशान कर देता है. ग्रीस संकट से यूरोपीय यूनियन व यूरो मुद्रा दबाव में है और दूसरे राष्ट्र भी इससे प्रत्यक्ष नहीं बल्कि परोक्ष से अभी से प्रभावित होने लगे. यदि इस संकट में विदेशी पून्जी वापस खींची गयी तो भारत के निवेश पर असर अवश्य पड़ेगा, लेकिन प्रत्यक्ष प्रभाव से भारत की अर्थव्यवस्था मुक्त रहेगी.

सभी वैश्विक वित्तीय बाजारों में उठापटक देखी जा रही है. जब से ग्रीस संकट गहराना शुरु हुआ है उसने सारे वित्तीय बाजारों को झकझोर दिया है. एशियाई बाजारों में पेट्रो क्रूड के भावों में गिरावट आयी है.
ग्रीस ने तो यूरोपीय यूनियन के पैकेज को ‘नाÓ कह दी अब क्या यूरोपीय यूनियन उसे ‘नाÓ कह कर यूरोपीय समुदाय से बाहर करने जा रहा है?

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