संकट के लिए जिम्मेदार कौन

हरीश दुबे
ग्वालियर,

गर्मी अब अपना पूरा असर दिखा रही है, इसी के साथ उत्तरी मध्यप्रदेश में पेयजल का जबर्दस्त संकट पैदा हो गया है, संकट इतना भयावह है कि इन्सानों के लिए ही नहीं बल्कि मवेशियों तक के लिए पीने का पानी नहीं है.

ग्वालियर में जलप्रदाय का एकमात्र स्त्रोत तिघरा बाँध है, इसका निर्माण ग्वालियर की छह लाख आबादी के लिए किया गया था, आज ग्वालियर शहर की आबादी 14 लाख है और अब तिघरा जलाशय इस महानगर की जलापूर्ति करने में नाकाम साबित हो रहा है.

इस वर्ष बारिश कम हुई, लिहाजा तिघरा में 15 जुलाई तक शहर को सप्लाई करने के लिए ही पानी बचा है. यदि पिछली साल की तरह इस मानसून में भी नामचारे की बारिश हुई तो शहर में क्या हालात बनेंगे, यह सोचकर ही अफ़सरों और प्रशासन को पसीना छूट रहा है. ग्वालियर में नलों से एक दिन छोडक़र पानी दिया जा रहा है और पानी की बर्वादी रोकने के लिए नए भवन निर्माण पर जुलाई तक के लिए पाबन्दी लगा दी गई है.

बहरहाल, जिला प्रशासन, नगर निगम और पीएचई ने पानी संकट का सारा ठीकरा जनता पर थोप कर अपनी जिम्मेदारी की बला टाल दी है. सच बात यह है कि करीब आठ दशक पहले तिघरा बनने के बाद से अब तक ग्वालियर में जलप्रदाय के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश ही नहीं की गई.

भारी जनदवाब के चलते अब चम्बल नदी के पानी से ग्वालियर की प्यास बुझाने के लिए एक्शन प्लान की डीपीआर बनाकर दिल्ली भेजी गई है, पचास किमी दूर चम्बल नदी से पानी ग्वालियर तक लाने का काम यदि आज शुरू होता है तो इसे पूरा होने में चार वर्ष लग सकते हैं.

यदि यही डीपीआर पांच वर्ष पहले बन जाती तो अब तक चम्बल का पानी ग्वालियर आ चुका होता. अम्रत योजना के तहत ग्वालियर को 450 करोड़ मिले हैं जिससे करीब 50 टेंक एवं सैकड़ो किमी लंबी पाइपलाइन डलना है, इस दिशा में भी काफ़ी सुस्त रफ्तार से काम हो रहा है. इस अंचल को पानी संकट से उवारने के लिए दूरदर्शितापूर्ण ठोस प्रयासों की जरूरत है.

यह सच है कि जनभागीदारी एवं जनरुचि के बिना प्रशासन के प्रयासों के सकारात्मक नतीजे मिलना मुश्किल है, लिहाजा प्रशासन को अपने प्रयासों को त्वरित ढंग से अंजाम देना होगा और जनता को भी इसमें ईमानदारी से सहयोगी बनना होगा, यह नहीं भूलना होगा कि जल है तो कल है.

चम्बल नदी का जलस्तर तेजी से घटा है, यही स्थिति इस अंचल में बहने वाली छौंदा, सिन्ध और पार्वती नदियों की है. ककेटो एवं पहसारी बाँध का जल स्तर कम हुआ है.किसान संकट में हैं. भिन्ड के गौरी सरोवर से लेकर दतिया का तालाब भी सूख रहा है.