बेमौसम बरसात की मार से रबी फसल के गेहूं के साथ चना की फसल भी 30 प्रतिशत तक खराब हो गयी. अभी अप्रैल में ही इसके भाव 20 प्रतिशत बढ़ गये. आगे और भी तेजी के आसार इसलिये हो गये हैं कि घरेलू और वैश्विक स्तर पर भी चना का उत्पादन घटा है. वायदा बाजार में चना 4300 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया है जबकि कुछ दिन पहले तक यह 3600 प्रति क्विंटल था. आवक कम और मांग बढ़ती ही जा रही है. पूरे आसार बन गये हैं कि देश चने का आयात करेगा और इसके दाम ऊपर ही होते जायेंगे. इस साल देश में 55-56 लाख टन चना का उत्पादन होने का अनुमान है जो पिछले साल के 65-66 लाख टन से 15 प्रतिशत कम है.

इस साल चना उत्पादन का लक्ष्य 93 लाख टन तय किया गया था, लेकिन अब 82-83 लाख टन पैदावार का अनुमान है. अनाजों में चना सिरमौर है. इसकी फसल कच्चे में भी होला के रूप में खायी जाती है. पकने पर यह अनाज है और इसकी गणना ‘ड्राई फ्रूटÓ में भी होती है. यह आटा भी है और बेसन भी है. यह भोजन है, मिठाई है और नमकीन भी है. अगर और कुछ नहीं है केवल चना है तो भोजन हो जायेगा. इसे ‘स्वादÓ भी कहा जाता है. इसे सिर्फ अकेले भी खाया जा सकता है. इसे पीसकर, उबालकर, गला कर, भूंज कर चाहे जैसा किसी भी स्वाद में तैयार कर लें.

यह इन सबके अलावा श्रृंगार प्रसाधन भी है. जब साबुन, शैम्पू, फेसवॉश- क्रीम का अविष्कार नहीं हुआ था तब यह साबुन-शैम्पू था. बड़े घर के लोग बेसन से और मध्यम व गरीब वर्ग के लोग पीली (मुल्तानी) व काली मिट्टïी से नहाते- बाल धोते थे. गालिब ने अपने एक मित्र को चि_ïी में लिखा था कि उस रोज उन्होंने बेसन से हाथ धोये थे- जैसे कोई बड़ा कमाल कर दिया हो. लेकिन उस जमाने में बेसन से हाथ धोना रईसी का काम था. शादियों में दुल्हन के साज-सिंगार में बेसन उबटन की बड़ी भूमिका होती है.

भारतेंदु हरिश्चंद्र का सुगम गीत ”चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदारÓÓ, कवि बच्चन की ”मधुशालाÓÓ और निराला की सरस्वती वन्दना ”वीणा वादिनी वर देÓÓ स्थाई साहित्य माने गये हैं.

कभी चना गरीबों का भोजन माना जाता था. जब गरीबी में कुछ नहीं होता था तो वह चना खाकर पौष्टिïक भोजन पा लेता था. आज चना सभी अनाजों में सबसे महंगा अनाज है. रोटी का सबसे बड़ा आधार गेहूँ-चना 15 से 30 रुपये किलो तक चल रहे हैं- चना 60 रु. किलो पर है. अब चना और तुअर दाल गरीबी का भोजन नहीं है बल्कि अमीरों का भोजन है. अब दाल-रोटी महंगी और सब्जी-रोटी सस्ती है. चना आटा भी है और दाल भी है, प्रसाधन भी है- ड्राई फ्रूट भी है- सवाल यह है कि चना क्या नहीं है. अगर चना को अलग करके देखा जाए तो रसोई-मिठाई व चाट की दुकानों से ‘स्वादÓ ही खत्म हो जायेगा. चना के अलावा अन्य किसी भी अनाज की इतने रूप और उपयोग नहीं होते हैं. इनकी कमी से देश में व्यापार के साथ-साथ काम-धंधों का बहुत बड़ा आधार ही खत्म हो जायेगा. चना का रोजगार मुहैया कराने में बहुत बड़ा योगदान है. कभी नमकीन हलवाई की दुकान तक बनता बिकता था. अब इसके बड़े-बड़े उद्योग और ”ब्रांड नेमÓÓ बन गये हैं. इसकी कमी का अर्थ होगा कि या तो कई बड़े कारखाने बंद हो जाएं.

चना का अभाव और उससे उत्पन्न भाव वृद्धि से खाने-पीने के बाजार व रसोई में बहुत-सी अन्य चीजों के भाव भी बढ़ जायेंगे. जैसे आलू के महंगा होते ही दूसरी सब्जियों के भाव स्वत: ही बढ़ जाते हैं. उसी तरह चना का अभाव व मूल्य वृद्धि से खाने की तमाम चीजों के भाव बढ़ते जा रहे हैं और खाद्यान्न मुद्रा स्फीति हो सकती है.

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